नई दिल्ली: गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर में अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती वहां की सुरक्षा की स्थिति और फेरबदल की जरूरत पर आधारित होती है, और ऐसी बातों पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा नहीं की जा सकती. मंत्रालय के सूत्रों ने यह भी कहा कि केंद्रीय बलों की 100 कंपनियों (10,000 सैनिकों) को एक हफ्ते पहले यहां तैनात करने का आदेश दिया गया था और वे अपने-अपने गंतव्यों पर पहुंचने की प्रक्रिया में हैं. इस आदेश से अतिरिक्त बलों की तैनाती की स्पष्ट तौर पर अटकलें तेज हो गई थी.

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सूत्रों ने कहा कि आंतरिक सुरक्षा स्थिति, प्रशिक्षण की आवश्यकताओं, आराम एवं स्वस्थ हो जाने के लिए अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती में फेरबदल की जरूरत, केंद्रीय बलों की तैनाती एवं वापसी एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. उन्होंने कहा कि तैनाती और किसी खास क्षेत्र में तैनात अर्द्धसैनिक बलों की गतिविधि के ब्योरे पर सार्वजनिक तौर पर कभी भी चर्चा नहीं की जाती. गृह मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया बृहस्पतिवार को उन खबरों के बाद आई है जिनमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में 28,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की जाने की संभावना है. राज्य में फिलहाल राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है.

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अनुच्छेद 35ए को निरस्त करने की भी योजना
अटकलें इस बात को लेकर भी तेज हैं कि केंद्र संविधान के अनुच्छेद 35ए को निरस्त करने की भी योजना बना रहा है. इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य की सरकारी नौकरियों एवं जमीन पर केवल राज्य के निवासियों का अधिकार होता है. ये अटकलें कश्मीर में पिछले कुछ दिनों से चर्चा का विषय बनी हुई हैं. हालांकि मुख्य राजनीतिक दल जैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने राज्य के विशेष दर्जे के साथ छेड़छाड़ करने वाले किसी भी कदम का विरोध करने की प्रतिबद्धता जताई है.

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पीएम से मिले थे नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता
बृहस्पतिवार को एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और उनसे ऐसा कोई भी कदम न उठाने की अपील की जो जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था को बिगाड़ दे. इस प्रतिनिधिमंडल में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी के एक सांसद शामिल थे. साथ ही उन्होंने मोदी से साल के अंत तक राज्य में विधानसभा चुनाव कराने में मदद की अपील भी की.