भारत-चीन के बीच करीब ढाई महीने से चल रहा डोकलाम विवाद आखिरकार खत्म हो गया. दोनों देश डोकलाम से अपनी-अपनी सेनाएं हटाने पर सहमत हो गए. इसे भारत की एक बड़ी जीत माना जा रहा है. हालांकि चीन भी अपनी जीत के दावे करते हुए कह रहा है कि वह सीमा पर गश्त जारी रखेगा. लेकिन, भारत ने जिस तरह आक्रामक चीन का सामना किया और अपने रुख पर अडिग रहा, उससे भारत की साख और बढ़ी है. चीन के लिए भी संदेश साफ हो गया है कि उसकी दादागीरी भारत जैसे देश पर नहीं चलेगी. Also Read - पीएम मोदी मंगलवार को IIT गुवाहाटी के दीक्षांत समारोह को करेंगे संबोधित, इंजीनियरिंग के छात्रों को मिलेगी डिग्री

चीन का तीन मोर्चों से हमला Also Read - 'पीएम मोदी कृषि बिल को ऐतिहासिक बता रहे हैं, वाकई ये है तो किसान ख़ुश क्यों नहीं'

आखिर कैसे भारत चीन को झुकने को मजबूर कर पाया, किन वजहों ने चीन को अपने रुख से पीछे हटने पर बाध्य कर दिया? चीन तीन मोर्चों से भारत को युद्ध की धमकी दे रहा था. कभी सरकारी मीडिया के जरिए, कभी अपने थिंकटैंक के जरिए तो कभी मंत्रालयों के जरिए उसने भारत को प्रभाव में लेने की भरपूर कोशिश की. चीनी अखबारों ने तो आए दिन धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल किया. धमकी दी कि भारत में अगर चीनी सैनिक घुस जाए तो क्या होगा. कश्मीर मामले पर दखल देने की धमकी दी. इन धमकियों के बीच चीन उंचे पहाड़ों पर युद्धाभ्यास करता रहा. मीडिया में इसकी खबरें प्रमुखता से छापी गईं. पीएलए की 90वीं वर्षगांठ पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि चीन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कभी समझौता नहीं करेगा और उसकी सेना हर हमले को विफल करने के लिए आश्वस्त है. लेकिन चीन की इन कोरी धमकियों से भारत टस से मस नहीं हुआ और आखिर में अपनी बात मनवाने में सफल रहा. Also Read - राज्यसभा में दोनों कृषि विधेयक पास, पीएम मोदी बोले- अन्नदाताओं को आजादी मिली, जारी रहेगी सरकारी खरीद

भारत का रुख

भारत लगातार जोर दे रहा था कि दोनों देश अपने जवान विवादित इलाके से हटा लें और बातचीत शुरू की जाए. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में बयान देते हुए ये बात साफ कर दी थी. लेकिन चीन की तरफ से हर बार यही कहा गया कि गलती भारत ने की है इसलिए पहले वह अपनी सेना हटाए. इसके लिए उसने कई बार धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल करते हुए भारत को सबक सिखाने की बात कही. चीन की सरकारी मीडिया ने भी भारत को धमकाने वाले लेख लिखे और मजाक भी उड़ाया. लेकिन भारत ने संयम बरतते हुए इसकी तीखा जवाब नहीं दिया और बिना शोर शराबे के सीमा पर अपनी तैयारी पुख्ता करता रहा.

डोवाल का चीन दौरा

27 जुलाई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल चीन पहुंचे. वह ब्रिक्स देशों के एनएसए की बैठक में हिस्सा लेने आए थे. इसी दौरान डोकलाम विवाद पर भी अहम बातचीत शुरू हुई. 3 अगस्त को चीन ने पहली बार माना कि डोकलाम पर बातचीत हो रही है. हालांकि, तब भी चीन ने नहीं माना कि वह किसी तरह की नरमी के मूड में है. उसने वही पुरानी बात दोहराई कि भारत की शर्तें मानने योग्य नहीं है और भारत जब तक अपनी सेना नहीं हटाता तब तक बातचीत से कोई हल नहीं निकलेगा. लेकिन अंदरखाने कूटनीतिक स्तर पर बातचीत चलती रही.

भारत का दृढ़ रुख

चीन लगातार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करता रहा. ना सिर्फ सरकारी मीडिया बल्कि उसके रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने भारत को धमकाना जारी रखा. लेकिन भारत ने अपना संयम नहीं खोया. चीन की चाल थी कि भारत आपा खोए और उसे झगड़ा बढ़ाने का मौका मिले. लेकिन भारत, चीन की चाल में नहीं फंसा और एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह बर्ताव करता रहा. हर मौके पर भारत ने साफ किया कि दोनों देश अपने सैनिक हटाएं और बातचीत आगे बढ़ाए. पर चीन इसे नकारता रहा और बंदर घुड़की देता रहा. उधर, भारत डोकलाम सीमा पर अपनी तैयारियां पुख्ता करता रहा. भारत के सख्त रुख के चलते चीन भी अचकचा गया, शायद उसे भारत से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. लाख चाहने के बावजूद वह डोकलाम में सड़क नहीं बना सका.

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भूटान का अहम रोल

डोकलाम पर अगर भारत को जीत मिली है तो इसका बड़ा श्रेय भूटान को भी जाता है. सालों से भारत का करीबी रहा भूटान इस मामले पर पूरी तरह भारत के साथ बना रहा. डोकलाम न भारत का हिस्सा है और न चीन का. एक तरह से ये भूटान की ही जमीन है जिस पर उसका चीन से विवाद है. अगर भूटान की तरफ से कोई भी गलत बयान आ जाता तो ये भारत के खिलाफ ही जाता. लेकिन भूटान ने सच्चे दोस्त की तरह बर्ताव करते हुए भारत पर पूरा भरोसा किया और डोकलाम पर भारत की हर कार्रवाई का स्वागत किया. अगर डोकलाम में चीन सड़क बनाने में कामयाब हो जाता तो भारत को हमेशा के लिए खतरा बना रहता. भूटान की संप्रभुता को भी चुनौती मिलती. लेकिन भूटान की समझदारी ने भारत के लिए स्टैंड लेना आसान कर दिया.

ब्रिक्स बैठक और मोदी का चीन दौरा

चीन के पीछे हटने की सबसे अहम वजह मानी जा सकती है ब्रिक्स सम्मेलन. सितंबर में ही चीन में ब्रिक्स सम्मेलन है. लेकिन इस अहम सम्मेलन पर डोकलाम विवाद की छाया पड़ती दिख रही थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इसमें जाने को लेकर कुछ भी साफ-साफ नहीं कहा गया था. दोनों देशों की ओर से इस पर चुप्पी साध ली गई थी. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने मोदी के चीन दौरे पर पूछे गए सवाल पर कन्नी काट ली थी. अगर मोदी सम्मेलन में नहीं पहुंचते तो चीन के लिए ये एक बड़ा झटका होता. पूरे विश्व में इसका गलत संदेश जाता. शायद चीन ने भी इसे भांप लिया और सम्मेलन से पहले ही एक सम्मानजनक फैसले पर राजी हो गया.