चेन्नईः पिछले दिनों एडल्ट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले के बाद चेन्नई में एक अजीब मामला सामने आया है. शनिवार को एक 24 वर्षीय महिला ने आत्महत्या कर ली. दरअसल, महिला के पति ने कहा कि वह (पत्नी) उसे दूसरी महिला के साथ अफेयर से नहीं रोक सकती क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब व्यभिचार यानी एडल्ट्री कोई अपराध नहीं है. इसके बाद पुष्पलता नामक महिला ने आत्महत्या कर ली. उसने अपने सुसाइड नोट में आत्महत्या का कारण भी यही लिखा है. पुलिस ने सुसाइड नोट बरामद कर लिया है. पुलिस महिला के पति से अब पूछताछ कर रही है. पति जॉल पॉल फ्रैंकलीन एक पार्क में सिक्योरिटी गार्ड का काम करता है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक पुलिस ने बताया कि दो साल पहले दोनों की शादी हुई थी. दोनों ने परिवार से बगावत कर शादी की थी. इस बीच पुष्पलता को टीबी हो गई और इसके बाद से जॉन पॉल उससे दूरी बनाने लगा. पुष्पलता ने जॉन के एक दोस्त को बताया था कि उनका पति जॉन अब किसी दूसरी महिला के करीब चला गया है. इसके बाद पुष्पलता ने जॉन से उस महिला से दूरी बनाने को कहा, लेकिन वह नहीं माना. उल्टे उसने दलील दी कि वह (पुष्पलता) उसके खिलाफ अब केस भी दर्ज नहीं करवा सकती क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी किसी दूसरी महिला से संबंध रखने को अपराध मानने से इनकार कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला
व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को ‘पुरातन’ और ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए निरस्त कर दिया था. न्यायालय ने कहा था कि यह महिलाओं को ‘संपत्ति’ के तौर पर मानता है और उन्हें उनकी ‘यौन स्वायत्तता’ से वंचित करता है. एक ऐतिहासिक फैसले में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के साथ-साथ सीआरपीसी की धारा 198 के व्यभिचार से संबंधित हिस्से को निरस्त कर दिया.

सीआपीसी की धारा 198 विवाह से जुड़े अपराधों में मुकदमा से संबंधित था. प्रधान न्यायाधीश ने खुद और न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर की तरफ से मुख्य फैसला लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि ‘पति स्वामी नहीं है’ और महिलाओं को अनादर, अन्यायपूर्ण और असमान या भेदभावपूर्ण तरीके से देखने वाली कोई भी व्यवस्था ‘संविधान के कोप को आमंत्रित करती थी.’

पीठ में शामिल तीन अन्य सदस्यों न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ नरीमन, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ ने भी इस राय से सहमति जताई कि व्यभिचार को अपराध नहीं माना जाना चाहिये. पीठ ने इसे स्पष्ट रूप से मनमाना, पश्चगामी बताते हुए कहा कि इसे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती.