
Parinay Kumar
परिणय कुमार को पत्रकारिता में लगभग 14 साल का अनुभव है. वह करियर की शुरुआत से ही पॉलिटिकल और स्पोर्ट्स की खबरें लिखते रहे हैं. 2008 में बिहार के ललित ... और पढ़ें
देश की राजधानी दिल्ली के तुर्कमान गेट के पास हुए बुलडोजर एक्शन ने एक बार फिर संजय गांधी के उस आदेश की यादें ताजा कर दी जब उन्होंने इसी जगह पर पहली बार ऐसी ही कार्रवाई की बात की थी. 1976 का वह दौर था जब अप्रैल के महीने में संजय गांधी अपने कुछ भरोसेमंद साथियों और तत्कालीन DDA वाइस चेयरमैन जगमोहन मल्होत्रा के साथ तुर्कमान गेट गए थे. वहां पहुंचते ही उन्होंने डीडीए के वाइस चेयरमैन को आदेश दिया,’मैं चाहता हूं कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ दिखाई दे.’ इसके बाद क्या था जगमोहन ने तय किया कि तुर्कमान गेट और जामा मस्जिद के बीच बनी सभी झुग्गियों और दूसरी इमारतों को गिरा दिया जाएगा. इस फैसले के साथ, भारत ने पहली बार बुलडोजर कार्रवाई देखी, जिसने सैकड़ों घरों को जमींदोज कर परिवारों को बेघर कर दिया.
संजय गांधी के आदेश को पूरा करने के लिए, 13 अप्रैल 1976 की सुबह एक पुराना बुलडोज़र तुर्कमान गेट पहुंचा. BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लोगों को गुस्सा होने से रोकने के लिए एक रणनीति बनाई गई और मजदूरों ने सबसे पहले पास के फुटपाथों को तोड़ना शुरू किया. DDA ने लोगों को भरोसा दिलाने की बहुत कोशिश की कि कोई घर नहीं गिराया जाएगा, लेकिन बुलडोजर को देखकर लोगों के मन में शक पैदा हो गया. कुछ निवासी बुलडोजर कार्रवाई को रोकने के लिए जगमोहन से मिलने गए, लेकिन जैसे ही वे ऐसा कर रहे थे बुलडोजर तुर्कमान गेट के पास की झुग्गियों और इमारतों पर चलने लगे. रोते-बिलखते लोग बेबसी से अपने घरों को टूटते हुए देखते रहे.

यह इमरजेंसी का समय था, जब देश में लोकतंत्र को आधा कुचल दिया गया था. विपक्षी नेता जेल में थे और लोगों से विरोध करने की आजादी भी छीन ली गई थी. तुर्कमान गेट का विध्वंस इमरजेंसी (1975-1977) के सबसे काले पन्नों में से एक है.यह एक ऐसा काला पन्ना है जिसे पलटने पर भी उंगलियों पर कालिख लग जाती है. जिनके घर तोड़े गए थे, वे चुप बैठने वाले नहीं थे. 19 अप्रैल 1976 को लगभग 500 महिलाएं अपने बच्चों के साथ विध्वंस वाली जगह पर इकट्ठा हुईं. अपनी बांहों पर काली पट्टियां बांधकर महिलाएं बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ डट गईं. उन्होंने बुलडोजरों को आगे बढ़ने से रोक दिया.
इसके बाद बड़ी संख्या में CRPF कर्मियों को बुलाया गया. फ़ोर्स राइफलों, आंसू गैस के गोलों और दंगा रोधी ढालों के साथ पहुंची. इस नजारे से भीड़ भड़क गई, और लोगों ने मलबे से पत्थर उठाकर सुरक्षाकर्मियों पर फेंकना शुरू कर दिया. छतों से भी पुलिस पर पत्थर फेंके गए. पुलिस ने फायरिंग की, लेकिन भीड़ पूरी तैयारी के साथ आई थी. लोग संकरी गलियों से निकले और सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया. हालात को काबू में करने के लिए, सुरक्षाबलों ने कई राउंड फायरिंग की, जिसमें कई लोग मारे गए.
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 14 राउंड फायरिंग हुई, जिसमें छह लोग मारे गए. हालांकि, माना जाता है कि मरने वालों की असली संख्या कहीं ज्यादा थी. कई लेखकों ने अपनी किताबों में इस घटना का जिक्र किया है और मरने वालों की संख्या के अलग-अलग आंकड़े दिए हैं. जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब ‘द जजमेंट’ में लिखा है कि पुलिस फायरिंग में 150 लोग मारे गए थे.
इमरजेंसी के दौरान, देश भर में लोगों को बेघर करने और विस्थापित करने वाले ज्यादातर तोड़फोड़ संजय गांधी के इशारे पर किए गए थे. तुर्कमान गेट का तोड़फोड़ भी ‘सुंदरता’ के नाम पर किया गया था. जब 1977 में इमरजेंसी की ज्यादतियों की जांच के लिए शाह कमीशन का गठन किया गया तो उसे शिकायतें मिलीं कि ये तोड़फोड़ कानून द्वारा तय प्रक्रियाओं का पालन किए बिना किए गए थे. दिल्ली में, 1973 और जून 1975 के बीच 1,800 ढांचे गिराए गए. इसके बाद, जून 1975 से मार्च 1977 तक (जब तक इमरजेंसी हटाई नहीं गई) अकेले दिल्ली में 1,50,105 ढांचे गिराए गए. अनुमान है कि इस दौरान लगभग 7,00,000 लोग विस्थापित हुए थे.
जब 6-7 जनवरी की दरमियानी रात को लगभग 1 बजे तुर्कमान गेट पर फैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास बुलडोजर कार्रवाई देखी गई, तो उस भयानक घटना को याद करना जरूरी हो गया. दिल्ली नगर निगम (MCD) ने मस्जिद के पास अवैध निर्माण को हटाने के लिए एक तोड़फोड़ अभियान शुरू किया. इस ऑपरेशन के लिए रात में 30 से ज्यादा बुलडोजर मौके पर पहुंचे, जिसका स्थानीय लोगों ने ज़ोरदार विरोध किया. पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंके गए. पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच झड़पों में पांच पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबर है, जबकि कई नागरिकों को भी चोटें आईं.
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