बेंगलुरू: कर्नाटक में एच डी कुमारस्‍वामी के नेतृत्‍व में आज कांग्रेस-जेडीएस की सरकार बनने से पहले राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की मौजूदगी देश के बदलते राजनीतिक हालात की ओर इशारा कर रही है. शपथ ग्रहण समारोह से पहले ही उन पार्टियों के नेता बेंगलुरू पहुंच गए जो केंद्र की सत्‍ता पर काबिज भाजपा और एनडीए गठबंधन के विरोधी हैं. इससे भी महत्‍वपूर्ण यह है कि इनमें कई ऐसी पार्टियों के प्रतिनिधि भी हैं जो कभी कांग्रेस के विरोधी खेमे में थे.

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कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की इस समारोह में मौजूदगी पर आश्‍चर्य नहीं. 2014 के बाद से लोकसभा चुनाव और राज्‍यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी को मिली लगातार हार के बाद यह जीत उसके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है. खासकर इसलिए भी कि बीजेपी ने कर्नाटक में सत्‍ता हथियाने के लिए कोई हथकंडा नहीं छोड़ा. लेकिन इसकी काट में कांग्रेस ने जिस तरह विपक्षी पार्टियों को एकजुट किया, वह 2019 के चुनाव से पहले एनडीए के खिलाफ एक देशव्‍यापी राजनीतिक गठबंधन की ओर इशारा कर रहा है.

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समारोह में एक ही मंच पर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो की एक साथ मौजूदगी उतना ही ध्‍यान खींचने वाला है जितना मायावती का सोनिया गांधी से गले मिलना. एन चंद्राबाबू नायडू के साथ ममता बनर्जी की उपस्थिति भी आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में नए राजनीतिक परिदृश्‍य का संकेत है. यह इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि ये दोनों पार्टियां भाजपा के खिलाफ गठबंधन के पक्ष में तो हैं, लेकिन इसमें कांग्रेस की हैसियत क्‍या हो, इसको लेकर उनके विचार अलग हैं.

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दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी भी उतनी ही महत्‍वपूर्ण है कयोंकि केजरीवाल कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से अब तक परहेज करते रहे हैं. इसी तरह वामपंथी धड़े के लिए भी यह विपक्षी एकजुटता के साथ दिखने का मौका था जिसे उन्‍होंने भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

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हालांकि, यह केवल एक शुरुआत भर है. गलबहियां करते हुए दिखने वाले विपक्षी दलों के लिए अभी सफर लंबा है. समारोह में मौजूद अधिकतर पार्टियों का अपने राज्‍यों में कांग्रेस के साथ सीधा मुकाबला है. कांग्रेस ने बीजेपी को रोकने के लिए कर्नाटक में ज्‍यादा सीटें मिलने के बावजूद जेडीएस को आगे बढ़कर मुख्‍यमंत्री का पद ऑफर कर दिया, लेकिन हर बार उससे ऐसी दरियादिली की उम्‍मीद नहीं की जा सकती. लेकिन भाजपा और एनडीए गठबंधन के लिए परेशानियां बढ़ाने के लिए ये तस्‍वीरें काफी हैं. यह इस बात का सबूत हैं कि उत्‍तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर से शुरू हुई विपक्षी एकता की कोशिशें अब अगले पड़ाव पर पहुंच चुकी हैं. अब चुनौती इसे 2019 के चुनाव से पहले एक ठोस स्‍वरूप देने की है. चुनौतियां और भी हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि गठबंधन में कांग्रेस की हैसियत क्‍या हो. राज्‍यों में सीटों के बंटवारे का बड़ा घालमेल है, लेकिन अच्‍छी बात यह है कि भाजपा का विरोध अब एक ठोस स्‍वरूप लेने लगा है और यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ी तो 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक परिदृश्‍य पूरी तरह बदला हुआ दिख सकता है.