नई दिल्ली। कर्नाटक संकट सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का ऐसा पहला मामला नहीं है जब शीर्ष अदालत ने आधी रात में अपने दरवाजे खोलते हुए सुनवाई की हो. बी एस येदियुरप्पा के कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ का रास्ता साफ करने वाली इस ऐतिहासिक सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कई उदाहरणों का जिक्र किया जब शीर्ष अदालत में मध्यरात्रि के बाद भी सुनवाई हुई. बता दें कि बुधवार देर रात करीब 2 बजे कांग्रेस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक संकट पर सुनवाई हुई थी. कांग्रेस ने अपनी अर्जी में कहा था कि राज्यपाल का बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता देना असंवैधानिक है और बीएस येदियुरप्पा को शपथ लेने से रोका जाए. अब मामले की सुनवाई शुक्रवार सुबह 10 बजे होगी. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकीलों से राज्यपाल के आदेश की कॉपी लेकर आने को कहा है. Also Read - SSR Case: बिहार पुलिस ने पूछा, बिना FIR दर्ज किए मुंबई पुलिस जांच कैसे कर रही थी?

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भाजपा के कुछ विधायकों की ओर से पेश पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने 29 जुलाई 2015 के उस वाकये को याद किया जब पीठ ने 1993 मुंबई विस्फोट मामले में मौत की सजा पाने वाले दोषी याकूब मेमन की प्रस्तावित फांसी पर रोक लगाने के अनुरोध पर मध्यरात्रि के बाद भी विचार किया और यह सुनवाई अगले दिन सुबह छह बजे तक चली.

कर्नाटक में झटके की भरपाई के लिए कांग्रेस का गोवा प्लान’

कर्नाटक संकट पर रात में सुनवाई का विरोध करने वाले रोहतगी ने कहा कि यह मेमन जैसा मामला नहीं है जो जीवन और मृत्यु की स्थिति से संबंधित था और इस में देर रात तत्काल सुनवाई नहीं होनी चाहिए. दूसरी तरफ के वकील ने उनकी दलीलों का विरोध किया और रात में सुनवाई को सही ठहराते हुए कहा कि इस मामले में संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन किया जा रहा है.

थापर को दी थी जमानत, हुआ था विवाद

इन दोनों ताजा मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने देर रात सुनवाई के अनुरोध को स्वीकार किया लेकिन न्यायविदों ने इस तरह की पहले की आपातकालीन स्थितियों को याद किया. साल 1985 में कड़े फेरा कानून के तहत आरोपित एक प्रमुख कारोबारी की जमानत याचिका पर सुनवाई करने के लिए मध्यरात्रि के बाद शीर्ष अदालत के दरवाजे खोले गये थे. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बहुत आलोचना हुई थी क्योंकि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ई एस वेंकटरमैया ने मध्यरात्रि में उद्योगपति एल एम थापर को जमानत दी थी.

रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई

अयोध्या में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद छह और सात दिसंबर 1992 की दरमियानी रात को एक जज के घर पर मध्यरात्रि के बाद भी सुनवाई जारी रही थी. अयोध्या मामला न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया के आवास पर सुना गया था जो बाद में प्रधान न्यायाधीश बने थे. इस मामले में कारसेवकों द्वारा विवादित ढांचा गिराने के बाद अयोध्या विवाद का एक पक्ष तुरंत शीर्ष अदालत पहुंच गया था. अपने घर सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया कि विवादित स्थल पर यथास्थिति कायम रखी जाए.