अमरावती/नई दिल्ली: आज यानी मंगलवार को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस समारोह धूमधाम से मनाया जा रहा है. अग्रेजों से आजाद हुए हमें 70 साल हो चुके हैं, लेकिन देश का बड़ा हिस्सा आज भी सही मायनों में आजादी से दूर ही है. खासतौर पर दूरदराज और गांवों की स्थिति ज्यादा गंभीर है. देश में अब भी कुछ जगह ऐसी है जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. स्वतंत्रता दिवस के खास मौके पर हम आपको आज एक गांव के माध्यम से ऐसे ग्रमीण भारत की तस्वीर बता रहे हैं जो विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है.

महाराष्ट्र के अमरावती शहर से करीब 75 किलोमीटर दूर और तालुका वरूड़ से 29 किलोमीटर दूर झोलंबा गांव है. झोलंबा आजादी के 70 सालों बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है. वर्तमान समय में हम जहां मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं उसी दौर में एक गांव ऐसा भी है जहां लोगों को बिजली, पानी, सड़क सहित अन्य आधारभूत जरूरी चीजों की दरकार है.

सालों से नहीं बनी सड़क

मुख्य रास्ते से स्कूल जा रहे बच्चे और बारिश के बाद सड़क की स्थिति.

मुख्य रास्ते से स्कूल जा रहे बच्चे और बारिश के बाद सड़क की स्थिति.

20 साल पहले बनी सड़क पूरी तरह से खस्ता हो चुकी है. गाड़ी तो दूर की बात बारिश के दिनों में इसमें पैदल चलना भी काफी मुश्किल हो जाता है. गांव वालों ने बताया कि यहां 2016 में नाम मात्र के लिए 500 मीटर सड़क का नवीनीकरण किया गया था, लेकिन बाकी 7 किलोमीटर सड़क का काम क्यों पूरा नहीं किया गया किसी को नहीं पता. बस स्टॉप भी है, लेकिन अब इस ओर बस भी नहीं आती है. बस स्टैंड की हालत भी देखते ही बनती है. काफी जर्जर हो चुका बस स्टैंड कब गिर जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. लोग दूसरे गांव या अन्य जगह जाने के लिए पैदल, बैलगाड़ी, शेयरिंग सवारी ऑटो का उपयोग करते हैं.

सालों पुराना जर्जर पुल

झोलंबा को हिवरखेड़ से जोड़ने वाला पुल पूरी तरह से जर्जर हो चुका है.

झोलंबा को हिवरखेड़ से जोड़ने वाला पुल पूरी तरह से जर्जर हो चुका है.

हिवरखेड़ की ओर से गांव में एंट्री करते समय खस्ता हो चुका पुल रास्ते में पड़ता है. जानकारी की तो पता चला कि इस पुल का निर्माण करीब 30 साल पहले किया गया था. पुलिया में कई जगह दरारें साफ देखी जा सकती हैं. बारिश के दिनों में पानी ओवरफ्लो होता है तो हालात और भी ज्यादा बिगड़ जाते हैं. बच्चें स्कूल नहीं जाते हैं. नया पुल कब बनेगा किसी को नहीं पता. शायद प्रशासन इस ओर तब ध्यान देगा जब यहां कोई बड़ा हादसा होगा.

पानी की टंकी के ऊपर चढ़ करते हैं फोन पर बात

झोलंबा में पानी की तीन टंकी, इनमें से दो की वाटर सप्लाई बंद है.

झोलंबा में पानी की तीन टंकी, इनमें से दो की वाटर सप्लाई बंद है.

एक ओर हम लोग जहां 4जी और वाई-फाई का लुत्फ उठा रहे हैं, वहीं यहां अब भी कुछ लोग पानी की टंकी के ऊपर चढ़कर बात करते हैं.  गांव में अब भी 2जी नेटवर्क है, सिर्फ आइडिया और वोडाफोन. 4जी के बारे में सुना है लेकिन यहां बेहतर नेटवर्क के लिए मोबाइल टॉवर नहीं है.

नहीं सुना ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के बारे में

जहां पूरी दुनिया में स्वच्छ भारत अभियान योजना के नाम पर सफाई का डंका जोर-जोर से पीटा जा रहा है, वहीं यह बात सुनने में काफी अटपटी लगती है कि यहां साल में महज 2 बार ही सफाई होती है. यह पूछे जाने पर कि क्या किसी ने स्वच्छ भारत अभियान के बारे में सुना है. इस बात का जवाब देने में मानों सबको सांप सूंघ गया हो. जब पूछा गया कि साफ सफाई होती है, तो जवाब मिला कि हां… साल में दो बार.

गांव के अंदर बने के एक रास्ते की तस्वीर.

गांव के अंदर बने के एक रास्ते की तस्वीर.

पुरूषों के लिए नहीं है शौचालय

गांव की अब भी एक बड़ी आबादी खुले में शौच करने जाती है. सवाल जवाब में पता चला कि यहां सार्वजनिक शौचालय तो है लेकिन सिर्फ महिलाओं के लिए है. पुरूषों के लिए नहीं है. 8 सीट वाले शौचालय की स्थिति काफी खराब हो चुकी है. गंदगी इतनी है कि आप खुले में ही जाना बेहतर समझेंगे. इसके अलावा शौचालय में लाइट की व्यवस्था नहीं है और उससे भी बड़ी बात यहां पानी का प्रबंध नहीं है.

बदहाल शिक्षा

गांव में एक छोटा सा सरकारी स्कूल है. स्कूल भी अपनी कहानी खुद ही बयां करता है. हालात देखते ही समझ आ जाएंगे. किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं है. डिजिटल इंडिया क्या है किसी को नहीं पता, लेकिन जब पूछा कि क्या कंप्यूटर है तो जवाब मिला हां, लेकिन चालू नहीं है. यहां पहली से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई होती है. 9 वीं से 12वीं तक की पढ़ाई के लिए यहां से 7 किलोमीटर दूर हिवरखेड़ जाना होता है, लेकिन खस्ताहाल सड़क और बेहतर ट्रांसपोर्टेशन न होने के चलते 7 किलोमीटर का ये सफर घंटों में तय होता है. कुछ बच्चे साइकिल से जाते हैं. कुछ पैदल ही जाने को मजबूर है. एसटी यानी लाल रंग की सरकारी बस पहले इस रास्ते से जाती थी.

रास्ता इतना उबड़-खाबड़ है और जगह-जगह इतने गड्ढे हैं कि बस ने भी इस सड़क को ‘अब बस’ कह दिया है. गांव वालों ने सरकार से मांग की है कि जल्द से जल्द सड़क का नवीनीकरण किया जाए, जिससे बच्चों को आगे की शिक्षा के लिए दूसरे गांव जाने में आसानी हो. 12वीं के बाद की पढ़ाई के लिए बच्चे तालुका वरुड़ 29 किलोमीटर, मोर्शी 15 किलोमीटर, अमरावती 82 किलोमीटर और नागपूर 129 किलोमीटर दूर जाते हैं.

गांव में नहीं देखा किसी ने भी डॉक्टर

स्वास्थ्य समस्याएं देश भर में लगभग एक जैसी ही है लेकिन बावजूद इसके यहां अब भी काफी अलग स्थिति है. नाम मात्र के लिए स्वास्थ्य केंद्र है लेकिन किसी ने भी डॉक्टर नहीं देखा है. हां एक नर्स जरूर है जो सप्ताह में महज दो बार आती है यानी दो दिन के लिए. बाकी 5 दिन अगर कोई इमरजेंसी हो तो लोग उसे दूसरे गांव ले जाते हैं. सड़क ऐसी है कि पहुंचते-पहुंचते आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मरीज की क्या स्थिति होती होगी.

ग्राम पंचायत के ऑफिस की हालत भी खराब

बातचीत में गांव वालों ने बताया कि यहां एक ग्राम पंचायत का ऑफिस भी है. यहां के हालात भी होश उड़ा देने वाले थे डिजिटल इंडिया के दौर में जहां अब हम मैक, विन्डो-10 की बात कर रहे हैं ऐसे में वहां अब भी बाबा आदम के जमाने का एक कंप्यूटर रखा है. कौन ऑपरेट करता है? कुछ पता नहीं, लेकिन गांव का एक लड़का अंकुर उसके बारे में थोड़ा बहुत जानता है. उसने बताया कि न तो यहां लैंडलाइन है और न ही इसमें इंटरनेट चलता है, क्या चलता है पता नहीं?

विदर्भ का हिस्सा, पानी की समस्या

यूं तो देश के कई राज्य सूखे की मार झेल रहे हैं. महाराष्ट्र का विदर्भ भी उन्हीं में से एक है. यह गांव भी विदर्भ का ही हिस्सा है इसलिए आप यहां की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं. गांव में पानी की कुल मिलाकर तीन टंकी है. 2 में सप्लाई बंद है. एक चालू है लेकिन उसका पानी यहां यानी झोलंबा के अलावा अन्य दो गांव नटाड़ा और ममदापुर में बारी-बारी से सप्लाई किया जाता है.

परिवहन

अब तक की रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आप यहां के ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम का भी अंदाजा लगा चुके होंगे. यहां एसटी (लाल रंग की बस) सुबह 8:45 बजे वरूड़ से आती है और वापस उसी रास्ते से लौट जाती है जबकि बच्चों को दूसरी ओर हिवरखेड़ 10:30 बजे स्कूल जाना होता है. सड़क खराब होने के चलते बस उस रास्ते में न जाकर वापस लौट जाती है. बस खाली आती है और खाली ही लौट जाती है. क्यूं आती है पता नहीं. हां कभी-कभी इक्का-दुक्का लोग उसमें यात्रा कर लेते हैं.

बिना सीवेज सिस्टम के 12 हजार में शौचालय

गांव में स्वच्छ भारत अभियान योजना के नाम पर 12 हजार रुपये की लागत से घर-घर में शौचालय बनाए जा रहे हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि न तो उन शौचालय में पानी की व्यवस्था की जा रही है न सीवेज सिस्टम और न ही सीवेज टैंक की. न तो शौचालय में फ्लश है और न ही लाइट. इससे भी बड़ी बात गैस पाइप तक नहीं है.

4फीट गहरे सीवेज टैंक में बिना प्लास्टर के ही ईंट की दीवार बनाई जा रही है. ठेकेदार यूसुफ के मुताबिक 500 ईंट, ढाई बोरी सीमेंट, 60 फीट (तसला) रेत, 1 टिन की चादर (छत, शेड) और 1200 रुपये के गेट की मदद से शौचालय का निर्माण किया जा रहा है. यूसुफ को इसी तरह से गांव में कुल 208 शौचालय बनाने हैं. ठेकेदार को भी नहीं पता कि यदी टैंक फुल होता है तो उसे खाली करने की क्या योजना होगी.

सांसद को नहीं है गांव की जानकारी

अमरावती सांसद आनंद राव अडसुल, झोलंबा की समस्या की चर्चा के दौरान.

अमरावती सांसद आनंद राव अडसुल, झोलंबा की समस्या की चर्चा के दौरान.

गांव की इन सभी समस्याओं को लेकर सांसद आनंद राव अडसुल (अमरावती संसदीय क्षेत्र) से बात की गई. आपको जानकर हैरानी होगी कि उन्हें इस गांव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. जब गांव का ब्यौरा दिया और लोकेशन बताई तो बाद में उन्होंने समस्याओं को सुलझाने और विधायक से इस मसले पर चर्चा करने का आश्वासन दिया है.

सरपंच को भी मिला आश्वासन

वहीं इन सभी विषयों पर जब सरपंच अर्चना ज्ञानेश्वर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि आला अधिकारियों को कई बार गांव की समस्याओं से अवगत करवा चुकी हैं. मुख्य रूप से सड़क की समस्या को लेकर, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला है. लिखित आवेदन भी दिया है लेकिन अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है. हां, इतना जरूर है कि हाल ही में सरपंच के माध्यम से गांव में पानी के लिए नई पाइल लाइन बिछाई गई जिससे गांव वालों को पानी की समस्या से थोड़ी राहत मिली है.

गांव की महिला सरपंच अर्चना ज्ञानेश्वर.

गांव की महिला सरपंच अर्चना ज्ञानेश्वर.

बहरहाल, यह केवल एक गांव की कहानी है. न जाने अब भी देश के कोने-कोने में कितने ही ऐसे गांव है जहां अब भी लोग सिर्फ बुनियादी सुविधाओं के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं. आजादी के 70 सालों बाद भी गांवों की ये बदहाली, चांद पर पहुंच चुके देश के लिए शर्म की बात है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस तरह के कई ग्रामीण इलाकों में उनकी योजनाओं के बारे में जानने वाला कोई नहीं है.

गांव की यह तस्वीर ऐसे समय में सामने निकलकर आई है जब देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत क्या है यह आप बेहतर समझ सकते हैं. आजादी के 70 सालों बाद जब डिजिटल इंडिया का नारा बुलंद किया जा रहा है ऐसे में गांवों की यह हालत सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों की नाकामी की दास्तान बयां करती है. हम हजारों मील दूर चांद पर तो पहुंच गए हैं लेकिन शहर से सटे गांवों में पहुंचने में अब भी नाकाम हैं.