भारत दुनिया के ऐसे देशों में से है, जिस पर बीमारियों का अत्यधिक बोझ है। बहुत सारी स्वास्थ्य योजनाएं अपने लक्ष्य और मकसद पूरा नहीं कर सकी हैं। वर्ष 2007 में डब्लयूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक, ‘पर कैपिटा’ स्तर पर स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में 191 देशों में भारत 164वें पायदान पर है। इस तरह चीन के सरकारी खर्च से 30 प्रतिशत तक कम है। यह माना जा रहा है कि देश में खराब स्वास्थ्य का प्रमुख कारण सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर कम खर्च करना है, जो कि दुनिया में सबसे कम है। इसे देखते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने स्वास्थ्य बजट में वृद्धि की मांग की है। यह भी पढ़े –  स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की तत्काल जरूरत

भारत के योजना आयोग द्वारा बनाए गए यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समूह ने नवंबर 2011 में 2022 के लिए रिपोर्ट दी थी। इसमें स्वास्थ्य फाइनेंस, स्वास्थ्य ढांचे, स्वास्थ्य सेवा शर्तो, कुशल कामगारों, दवाओं और वैक्सीन तक पहुंच, प्रबंधकीय और संस्थागत सुधार और सामुदायिक भागेदारी जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई थी।
आयोग के अनुमान के मुताबिक, 12वीं योजना के तहत सन् 2012 से 2017 के दौरान 3.30 करोड़ खर्च किए जाने का अनुमान है, ताकि यूएचसी का 2022 का लक्ष्य पूरा किया जा सके। हम बारहवीं योजना के तीसरे साल में प्रवेश कर चुके हैं और अभी इस बजट का बहुत छोटा हिस्सा मिल पाया है।

आईएमए के महासचिव डॉ के.के. अग्रवाल का कहना है कि सरकार को मौजूदा जीडीपी 1.1 प्रतिशत बजट खर्च को बढ़ा कर 12वीं योजना के तहत कम से कम 2.5 प्रतिशत तक करना चाहिए और 2022 तक जीडीपी का 3 प्रतिशत होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह प्राथमिक स्वास्थ्य पर 55 प्रतिशत, द्वितीयक पर 35 प्रतिशत और तीसरे देखभाल सेवाओं पर 10 प्रतिशत तक बजट खर्च करने का प्रावधान लाजमी बनाए।

आईएमए के परामर्श :

* बारहवें वित्त आयोग ने कुछ चुने हुए राज्यों को स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए चुना, लेकिन असल में उन्होंने राज्यों द्वारा किए जा रहे खर्च और आवश्यक खर्च के मध्य की कमी के केवल 30 प्रतिशत हिस्से को ही पूरा किया। इसे कमी के 50 प्रतिशत तक होना चािहए।

* केंद्र सरकार द्वारा दी जानी वाली अतिरिक्त राशि सीधे प्राइमरी हेल्थ केयर और सेकेंडरी हेल्थ केयर के पहले स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे और पेशेवरों की कमी को पूरा करने पर खर्च होना चाहिए।

* सरकारी स्तर पर दवाइयों की खरीद के लिए 0.1 प्रतिशत से बढ़ाकर जीडीपी का 0.5 प्रतिशत खर्च होना चाहिए।

* सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए जो दवा कंपनियों को बाजार में ट्रेड नाम प्रयोग करने से रोके। दवाएं केवल रासायन के नाम से बिकनी चाहिए, जिससे दवाओं की एकरूपता में मदद मिलेगी। इसके साथ ही दवाएं उच्च गुणवत्ता की उपलब्ध हों, इसकी निगरानी का ढांचा भी विकसित होना चाहिए।

* सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए पानी, स्वच्छता और साफ सफाई मुख्य कारक हैं। सरकार को ना सिर्फ इस क्षेत्र का बजट बढ़ाना चाहिए बल्कि वह पैसा सही तरीके और सही समय के अंदर खर्च हो।

* हेल्थ केयर सिस्टम पर हुए खर्च की वापसी की योजना केंद्रीय कर्मचारियों के साथ-साथ संगठित क्षेत्र में काम कर रहे सभी लोगों पर लागू हो।

* फैमिली डॉक्टर, एक व्यक्ति द्वारा चलाए जा रहे क्लिनिक की सेवाएं रिटेनरशिप बेसिस पर ली जाएं।

* सरकार स्वास्थ्य जागरूकता योजनाओं पर होने वाले खर्च के बजट में भी बढ़ोतरी करे।