नई दिल्‍ली: भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का एक फीसदी खर्च करता है. जबकि पड़ोसी देश नेपाल, भूटान और श्रीलंका समेत कम आय वाले कई देश भारत से ज्‍यादा सावर्जनिक स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्च करते हैं. नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक देश के गांवों में 11,082 लोगों के लिए एक एलोपैथिक डॉक्टर है.Also Read - भारत से विदा हुआ दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून, 1975 के बाद 7वीं बार सबसे देर से हुई रवानगी

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भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय-अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक फीसदी- 2014 में 0.98% से मामूली सुधार हुआ हुआ, लेकिन यह अभी तक कम आय वाले देशों से पीछे है, जो औसत पर 1.4% खर्च करते हैं. सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस, द्वारा मंगलवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक भारत स्वास्थ्य पर भूटान (2.5%), श्रीलंका (1.6%) और नेपाल (1.1%) जैसे कुछ पड़ोसी देशों से भी कम खर्च कर रहा है.

भारत बांग्‍लादेश से ऊपर

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में, जिसमें 10 देशों शामिल हैं, भारत केवल अंतिम बांग्लादेश (0.4%) से ऊपर है. सूची में शीर्ष स्थान का दावा करने के लिए मालदीव अपने सकल घरेलू उत्पाद का 9.4% खर्च करता है, इसके बाद थाईलैंड (2.9%). भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017-2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद का 2.5% तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखती है.

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री बोले-कर रहे काम

इस बाबत केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि हम इस पर काम कर रहे हैं और लक्ष्य को पूरा करने की उम्मीद कर रहे हैं. यह रातोंरात नहीं होगा लेकिन हम सही रास्ते पर हैं. यदि आप मातृ और शिशु मृत्यु दर जैसे स्वास्थ्य देखभाल संकेतकों को देखते हैं, तो हम वैश्विक लक्ष्य की तुलना में अधिक दर में सुधार कर रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, देश के गांवों में 11,082 लोगों के लिए एक एलोपैथिक डॉक्टर के साथ डॉक्टरों की कमी अभी तक एक समस्या है. रिपोर्ट में मलेरिया, मच्छर से पैदा होने वाली बीमारी के कारण मृत्यु की संख्या में भी कमी आई है, जिसमें 2017 में 104 लोग मारे गए थे, जबकि पिछले वर्ष 331 मौत की सूचना मिली थी.