दुश्मन के तोपों की धज्जियां उड़ा देंगे ये नए गोले, जल्द ही भारतीय सेना को मिलेगी एडवांस्ड आर्टिलरी सेल

Written By: Satyam Kumar Updated by: Satyam Kumar
Updated Date:January 13, 2026 6:20 PM IST

आईआईटी मद्रास (IIT Madras) ने रामजेट तकनीक के जरिए स्वदेशी तोप के गोलों की मारक दूरी को 50% तक बढ़ाकर डिफेंस सेक्टर में क्रांति ला दी है, जिससे अब भारतीय तोपें 70 किमी दूर तक अचूक निशाना लगा सकेंगी.

रक्षा तकनीक (Defense Technology) के क्षेत्र में भारत ने एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जो युद्ध के मैदान में भारतीय सेना के तोपखाने (Artillery) की तस्वीर पूरी तरह बदल देगी. आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे बिना नई तोपें खरीदे ही मौजूदा तोपों की मारक क्षमता को अविश्वसनीय रूप से बढ़ाया जा सकता है.

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IIT मद्रास की जबरदस्त खोज

आईआईटी मद्रास ने स्वदेशी रक्षा अनुसंधान में एक बड़ी छलांग लगाते हुए रामजेट आधारित आर्टिलरी शेल (तोप के गोले) विकसित किए हैं. इन विशेष गोलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्होंने मौजूदा भारतीय तोपों की मारक दूरी को लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है. सबसे राहत की बात यह है कि दूरी बढ़ने के बावजूद इन गोलों की मारक क्षमता और मार करने की सटीकता में कोई कमी नहीं आई है.

Ramjet technique

तोपों की रेंज में जबरदस्त इजाफा

इस नई तकनीक का परीक्षण अलग-अलग तोप प्रणालियों पर किया गया और इसके परिणाम चौंकाने वाले रहे. 155 मिमी के सामान्य आर्टिलरी शेल में रामजेट इंजन लगाने के बाद उनके प्रदर्शन में भारी सुधार देखा गया,

  • ATAGS तोप: इसकी रेंज 40 किमी से सीधे बढ़कर 70 किलोमीटर हो गई,
  • K9 वज्र (स्वचालित होवित्जर): इसकी मारक क्षमता 36 किमी से बढ़कर 62 किमी तक पहुंच गई,
  • धनुष तोप: इसकी रेंज भी 30 किमी से बढ़कर 55 किमी हो गई है,

क्या है यह 'रामजेट' तकनीक?

आमतौर पर तोप का गोला दागे जाने के बाद केवल शुरुआती वेग (Velocity) और गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है, लेकिन रामजेट एक ऐसा इंजन होता है जो हवा को तेज रफ्तार से सोखकर उसे दबाता है और फिर उसमें ईंधन मिलाकर थ्रस्ट (धक्का) पैदा करता है. इसमें रॉकेट की तरह भारी ऑक्सीजन ले जाने की जरूरत नहीं होती क्योंकि यह वायुमंडल की ऑक्सीजन का इस्तेमाल करता है. जब ये गोले तोप की नली से बाहर निकलते हैं, तो रामजेट इंजन सक्रिय हो जाता है, जिससे इन्हें हवा में ही अतिरिक्त ताकत मिलती रहती है और ये काफी दूर तक मार कर पाते हैं.

लागत में कमी और बेजोड़ मारक क्षमता

आईआईटी मद्रास के अधिकारियों के अनुसार, यह तकनीक रॉकेट-असिस्टेड शेल्स या सामान्य एयरोडायनामिक सुधारों से कहीं आगे की चीज है, जहां लंबी दूरी के लिए महंगी और जटिल मिसाइल प्रणालियों की जरूरत होती थी, वहां अब ये सस्ते तोप के गोले वही काम कर सकेंगे. तोपें आज भी युद्धक्षेत्र की रीढ़ मानी जाती हैं क्योंकि वे टिकाऊ और किफायती होती हैं. इन नए गोलों के आने से सेना को मोबिलिटी या तैनाती से समझौता किए बिना मिसाइलों जैसी घातक पहुंच मिल जाएगी.

सेना और IIT मद्रास का साझा मिशन

भारतीय सेना ने इस महत्वपूर्ण परियोजना की शुरुआत 2020 में आईआईटी मद्रास के साथ मिलकर की थी. इस मिशन का नेतृत्व प्रो. पी. ए. रामकृष्ण और लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) पी. आर. शंकर जैसे अनुभवी विशेषज्ञों की टीम ने किया. देवलाली और पोखरण के तपते रेगिस्तानों में किए गए कई फील्ड और गन ट्रायल्स ने यह साबित कर दिया कि ये गोले न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि हवा में इनका संतुलन और रामजेट इंजन का प्रज्वलन पूरी तरह सफल है. एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर पी. ए. रामकृष्ण का मानना है कि यदि यह तकनीक पूरी तरह लागू होती है, तो भारतीय तोपखाना इकाई 50 प्रतिशत अधिक गहराई तक दुश्मन के ठिकानों को तबाह कर सकेगी. इससे कमांडरों को युद्ध के दौरान अधिक सामरिक विकल्प मिलेंगे. वहीं, आने वाले समय में इसी रामजेट तकनीक का उपयोग रॉकेटों की रेंज बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है, जिस पर अभी शोध जारी है.

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