नई दिल्ली| भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले 56 सालों से जारी विवाद पर सोमवार को एक बार फिर बातचीत होने जा रही है। इस मामले में भारतीय प्रतिनिधि मंडल इस्लामाबाद पहुंच चुका है। दोनों देशों के बीच ये बातचीत उड़ी हमले के 6 महीने बाद होने जा रही है। हांलाकि भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह सिंधु जल संधि में मिले अपने अधिकारों के साथ समझौता नहीं करेगा।
पाकिस्तान आए दिन विश्व बैंक से भारत के खिलाफ शिकायत करता रहता है कि भारत की ओर से सिंधु जल समझौते का ठीक तरह से पालन नहीं किया जा रहा है। पाकिस्तान शुरु से ही सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर भारत की परियोजनों का विरोध करता रहा है। इनमें भारत की 5 जल विद्युत परियोजनाएं सिंधु नदी पाकल दुल, रातले, किशनगंगा, मियार और लोअर कालनई परियोजनाएं शामिल हैं। पाक इन परियोजनाओं को जल समझौते का उल्लंघन बताता है।
बता दें दोंनों देशों ने इस विवाद के मद्देनजर सिंधु जल आयुक्त बना रखा है। इनकी हर 6 महीने में बैठक होना भी तय है। लेकिन 18 सितंबर को हुए उड़ी हमले के बाद से इस बैठक को स्थगित कर दिया गया था। अब फिर से दोनों देशों के इस मामले में द्विपक्षीय बातचीत होने जा रही है। सिंधु जल आयुक्त पीके सक्सेना के नेतृत्व में 10 सदस्यीय दल पाकिस्तान पहुंच चुका है। इसमें विदेश मंत्रालय के अधिकारी और तकनीकि विशेषज्ञ शामिल हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बैठक के दौरान भारत के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ये साफ कर चुके हैं कि सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर भारत अपनी परियोजनाओं को पूरा करने में तेजी लाएगा और अपने हिस्से के ज्यादा से ज्यादा पानी का उपयोग करेगा। यह भी पढ़ें: सिंधु जल विवाद मामले में अमेरिका ने दिया दखल, भारत से संबंध हो सकते हैं खराब
क्या है सिंधु जल समझौता?
19 सितंबर 1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच कराची में विश्व बैंक की मध्यस्थता में इस संधि पर हस्ताक्षर किये गए थे। संधि के तहत सिंधु घाटी में बहने वाली 6 नदियों को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बांटा गया। पूर्वी हिस्से में सतलुज, रावी और व्यास को शामिल किया गया जिन पर भारत का पूर्ण अधिकार है। वहीं पश्चिमी हिस्से की सिंधु, चेनाब और झेलम पर पाकिस्तान का अधिकार लेकिन इसके इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को दिया गया। संधि के मुताबिक भारत पश्चिमी हिस्से की नदियों के 20 प्रतिशत पानी का ही इस्तेमाल बिजली बनाने और कृषि आदि के लिए कर सकता है।
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