International Sex Workers Day 2020: अंतर्राष्ट्रीय वेश्यावृत्ति अधिकार दिवस या इंटरनेशनल सेक्स वर्कर्स डे (International Sex Workers Day) हर साल 2 जून को मनाया जाता है. वैसे तो इस दिन को इस उद्देश्य से मनाया जाता है ताकि यौनकर्मियों के अधिकारों के बारे में जागरुकता फैलाई जा सके जिससे कि वे भी ‘सम्मान’ की जिंदगी बसर कर सकें. लेकिन ऐसा असल में होता बहुत कम है. अजमेरी गेट से लाहौरी गेट तक एक किलोमीटर से अधिक दूरी तक फैले गास्र्टिन बैस्टियन (जीबी) रोड की गिनती भारत के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया में होती है. यहां आए दिन कई गैर-लाभकारी संगठनों के माध्यम से पता चलता है कि लड़कियों को देश के अलग-अलग कोनों से लेकर लाया जाता है. सभी की अपनी-अपनी कहानियां हैं. कुछ इस ‘दलदल’ से निकल जाती हैं तो कुछ यहीं की होकर रह जाती हैं. मौजूदा समय में पूरी दुनिया में फैली करोना महामारी ने इनका जीवन दूभर कर दिया है. Also Read - Covid-19: रूस को पीछे छोड़ दुनिया में कोरोना से तीसरा सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना भारत

क्यों मनाया जाता है इंटरनेशनल सेक्स वर्कर्स डे?
अंतर्राष्ट्रीय सेक्स वर्कर्स दिवस हर साल 2 जून को मनाया जाता है. 1970 के दशक में, फ्रांसीसी पुलिस ने यौनकर्मियों को गुप्त रूप से काम करने के लिए मजबूर किया था. लेकिन पुलिस इसे ज्यादा दिन तक दबाकर नहीं रख पाई. नतीजा ये निकला कि यौनकर्मियों की सुरक्षा में कमी आई और उनके खिलाफ पहले से और अधिक हिंसा हुई. 2 जून 1975 को, लगभग 100 यौनकर्मियों ने अपने अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए फ्रांस के ल्योन में सेंट-निज़ियर (St. Nizier) चर्च पर कब्जा कर लिया और हड़ताल पर चले गए. हड़ताल पर जाने के बाद सेक्स वर्कर्स ने सरकार से काम करने की अच्छी स्थिति और कलंक को समाप्त करने की मांग की थी. ताकि उनकी आपराधिक और शोषणकारी जीवन स्थितियों के बारे में सरकार के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त कर सके. Also Read - Coronavirus in Rajasthan Update: राजस्थान में नहीं थम रहा कोरोना से मौत का सिलसिला, मरने वालों की संख्या 450 के पार

इन सेक्स वर्कर्स की इसी मुहिम ने एक बड़ा रूप ले लिया. हालांकि समाज का खुले तौर पर समर्थन न होने के चलते 10 जून को शाम 5 बजे जवाबी कार्यवाही करते हुए चर्च पर पुलिस बलों द्वारा क्रूरतापूर्वक हमला किया गया. इसके आठ दिन बाद चर्च को खाली करवा लिया गया. लेकिन कहते हैं कि किसी क्रांति की ज्वाला को हल्की चिंगारी की जरूरत होती है और पुलिस की इसी कार्रवाई ने उसी चिंगारी का काम किया. सरकार की इस कार्रवाई ने एक राष्ट्रीय आंदोलन को जन्म दिया. फ्रांस से शुरू हुए इस आंदोलन ने वैश्विक रूप ले लिया. जिसके बाद यह दिन अब International Sex Workers Right Day के रूप में यूरोप और दुनिया भर में मनाया जाता है. Also Read - Coronavirus In India Update: कोरोना के ये हैं सबसे ज्यादा डरावने आंकड़े, 24 घंटे में 613 लोगों की मौत

कोरोना की मार झेल रही हैं सेक्स वर्कर
पूरी दुनिया में फैली करोना वायरस महामारी ने हर किसी के जीवन को किसी न किसी रूप से प्रभावित किया है. सेक्स वर्कर्स पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा है. शारीरिक दूरी ने उनका जीवन मुश्किल कर दिया है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अजमेरी गेट से लाहौरी गेट तक एक किलोमीटर से अधिक दूरी तक फैले जीबी रोड स्थित रेड लाइट एरिया इन दिनों वीरान नजर आ रहा है. यहां आमतौर पर दुकानों के ऊपर स्थित जर्जर भवनों या कोठों में करीब 4000 वेश्याएं (सेक्स वर्कर) काम करती हैं, मगर राष्ट्रव्यापी बंद के दौरान इनमें से फिलहाल 25 से 30 प्रतिशत महिलाएं ही बची हुई हैं. अब भले ही लॉकडाउन खुलने लगा हो लेकिन इन सेक्स वर्करों का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है.

भारत की 6,37,500 सेक्स वर्करों का भविष्य अनिश्चित
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के अनुसार, भारत में लगभग 6,37,500 यौनकर्मी हैं और पांच लाख से अधिक ग्राहक दैनिक आधार पर रेड-लाइट क्षेत्रों का दौरा करते हैं. लेकिन कोरोना वायरस महामारी के चलते इनका भविष्य अंधकार में है. हालांकि कारण भी है. इस मामले में संक्रमण फैलने की दर अधिक हो सकती है, क्योंकि यौन क्रिया या संभोग के दौरान सामाजिक दूरी संभव नहीं है. संक्रमित ग्राहक लाखों अन्य नागरिकों को यह बीमारी फैला सकते हैं. येल स्कूल ऑफ मेडिसिन और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शिक्षाविदों एवं शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया कि भारत में अगर राष्ट्रव्यापी बंद खत्म भी हो जाता है तो यहां रेड-लाइट एरिया (ऐसे स्थान जहां वेश्यावृत्ति होती है) को बंद ही रखा जाना चाहिए. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ऐसा किया गया तो भारत में कोरोना वायरस के मामलों के चरम पर पहुंचने में 17 दिनों की देरी लाई जा सकती है. इसके अलावा इससे कोविड-19 के अनुमानित नए मामलों में 72 फीसदी की कमी लाई जा सकती है. ‘मॉडलिंग द इफैक्ट ऑफ कॉन्टिन्यूड क्लोजर ऑफ रेड-लाइट एरियाज ऑन कोविड-19 ट्रांसमिशन इन इंडिया’ नाम के अध्ययन में पाया गया है कि अगर राष्ट्रव्यापी बंद के बाद तक रेड लाइट एरिया को बंद रखा जाता है तो भारतीयों को कोरोनावायरस होने का बहुत कम जोखिम है.

शारीरिक दूरी ने जीवन मुश्किल कर दिया
मार्च का महीना शुरू होते ही देश में कोरोनावायरस का प्रकोप बढ़ना शुरू हुआ, तभी से इन कोठों में रात के दौरान आने वाले ग्राहकों की संख्या में भी कमी होती चली गई. इसके बाद 23 मार्च से जनता कर्फ्यू व इसके बाद सामाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश आए और तभी से यहां लोगों का आना पूरी तरह से बंद हो गया. जीबी रोड पर दो और तीन मंजिला इमारतें हैं, जहां भूतल पर दुकानें हैं और पहली व दूसरी मंजिल पर वेश्यालय चलते हैं. कोठा नंबर-54 में लगभग 15-16 यौनकर्मी हैं, जिनमें ज्यादातर नेपाल और पश्चिम बंगाल की हैं. उन्होंने वापस जाने के विकल्प को चुना है.