नई दिल्ली. प्रसिद्ध शायर और बॉलीवुड फिल्मों के गीतकार. यही परिचय है साहिर लुधियानवी का. साहिर का जीवन विषाद, प्रेम में आत्मिकता और समाज की रूढ़ियों के प्रति आक्रोश से भरा रहा. उनके लिखे गीत हों या गजल, सबमें उनका व्यक्तित्व झलकता है. शायरी से साहिर का ताल्लुक उनके कॉलेज के जमाने से ही था. इसी कारण मशहुर साहित्यकार अमृता प्रीतम उनके प्रेम में भी पड़ीं. कहा जाता है कि अमृता उनके शेरों की दीवानी थी. लेकिन साहिर के साथ उनका यह प्रेम अमृता के घरवालों को रास नहीं आया और साहिर को कॉलेज छोड़ना पड़ा. लुधियाना के रईस परिवार में जन्मे साहिर का मूल नाम अब्दलु हयी साहिर था. साहिर के गीतों और कविताओं में दर्द की प्रधानता रही है. महिलाओं पर केंद्रित उनके गीत आज भी आपकी आंखों को नम कर सकते हैं. फिल्म ‘साधना’ का गीत ‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उन्हें बाजार दिया…’, औरतों पर लिखी गई बेहतरीन रचनाओं में से एक है. यह संयोग ही है कि आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है और आज ही साहिर की जयंती भी. फिल्मी दुनिया के इस बेहतरीन गीतकार और उर्दू शायरी के अद्भुत नगीने की कुछ रचनाएं आपके हाजिर हैं… Also Read - 'इंडिया' शब्‍द हटाकर 'भारत' या 'हिंदुस्तान' करने की पिटीशन पर SC में 2 जून को सुनवाई

औरत ने जनम दिया मर्दों… Also Read - भारत में जून-जुलाई में तबाही मचा सकता है कोरोना वायरस, अपने चरम पर होगा संक्रमण

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा दुत्कार दिया Also Read - BRICS समूह के विदेश मंत्रियों की मीटिंग, जयशंकर बोले- कोरोना से जंग में 85 देशों की मदद कर रहा है भारत

तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में
ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में

मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता

जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया
जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया

संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है
चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है
अवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

ताज

ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही
तुझको इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशां
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी

मेरी महबूब! पस-ए-पर्दा-ए-तशहीर-ए-वफ़ा

तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उनके
लेकिन उन के लिये तशहीर का सामान नहीं
क्योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारात-ओ-मक़ाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतल-क़ुलहुक्म शहंशाहों की अज़मत के सुतूं
सीना-ए-दहर के नासूर हैं ,कुहना नासूर
जज़्ब है जिसमें तेरे और मेरे अजदाद का ख़ूं

मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सन्नाई ने बख़्शी है इसे शक्ल-ए-जमील
उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ंदील

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!

वो सुबह कभी तो आएगी

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी