नई दिल्ली. कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद कांग्रेस में आए बदलाव और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति पर हमारी सहयोगी वेबसाइट जी न्‍यूज डिजिटल के ओपीनियन एडिटर पीयूष बबेले से लंबी बातचीत की. रमेश ने कहा कि नरेंद्र मोदी को सत्‍ता से हटाने के लिए जो भी त्‍याग करना पड़ेगा, उसके लिए कांग्रेस तैयार है. संभावित गठबंधन सहयोगियों से लेकर कांग्रेस की गलतियों और भविष्‍य की रणनी‍ति पर उन्‍होंने बेबाकी से अपनी बात रखी. यहां पेश हैं इंटरव्‍यू के खास अंश:

सवाल: राहुल गांधी को कांग्रेस अध्‍यक्ष बने पांच महीने हो गए हैं, इस दौरान कांग्रेस में कौन से खास बदलाव आए हैं?
जवाब: राहुल गांधी ने अध्‍यक्ष बनने के बाद कांग्रेस अधिवेशन में कहा था कि पार्टी में बुजुर्ग और नौजवान दोनों को जगह मिलेगी, लेकिन अगर उनके अध्‍यक्ष बनने के बाद की नियुक्तियां देखें तो सचिव और दूसरे प्रमुख पदों पर युवाओं को बड़ी संख्‍या में जगह दी जा रही है. यह कांग्रेस में आया वह बदलाव है जिसकी मांग लंबे समय से उठाई जा रही थी. दूसरा बदलाव आपने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद देखा होगा. इस बार मणिपुर, गोवा या अरुणाचल प्रदेश की तरह पार्टी ने देर नहीं लगाई और विपक्ष के किसी फैसले से पहले कांग्रेस हाईकमान ने फैसले किए. अगर पहले की तरह फैसले लिए जाते तो कर्नाटक कांग्रेस के हाथ से निकल सकता था. कर्नाटक हमारे पास रहना बहुत जरूरी था, वरना कांग्रेस सिर्फ तीन राज्‍यों में सिमटकर रह जाती. कांग्रेस ने न सिर्फ तेजी से फैसला लिया, बल्कि बड़ा दिल भी दिखाया. छोटी पार्टी होने के बावजूद जेडीएस को मुख्‍यमंत्री का पद बिना शर्त ऑफर किया और बाद में वित्‍त मंत्री का पद भी दिया. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि मेरे जैसे पुराने कांग्रेसियों को यकीन ही नहीं हुआ कि यह कांग्रेस पार्टी ही है, या कोई दूसरी पार्टी.

सवाल: तो यह समझा जाए कि सोनिया गांधी की अध्‍यक्षता में फैसले देरी से होते थे, राहुल ने वह तरीका बदला है?
जवाब: इस तरह की तुलना ठीक नहीं है. अगर आप देखें तो सोनिया जी की उम्र और राहुल जी की उम्र में 25 साल का फर्क है. यह एक पीढ़ी का बदलाव है, जनरेशन चेन्‍ज है. तेजी से होते फैसलों में पीढ़ी का यही बदलाव दिख रहा है. कांग्रेस के लिए यह बहुत अच्‍छा है.

सवाल: आप गठबंधन की बात कर रहे हैं, आपको कहां-कहां गठबंधन की संभावना दिख रही है?
जवाब: यूपी से ही शुरू करें, तो पहले गोरखपुर-फूलपुर और अब कैराना तीनों जगह गठबंधन का असर दिख रहा है. यूपी में सपा, बसपा, रालोद और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगी. बिहार में राष्‍ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन पहले से ही है, इसमें एक-दो दल और आ सकते हैं. झारखंड में हम जेएमएम और जेवीएम दोनों को साथ लाएंगे. महाराष्‍ट्र में एनसीपी के साथ लड़ेंगे. केरल में पहले से गठबंधन है. कर्नाटक में जेडीएस के साथ समझौता हो चुका है. तेलंगाना में भी गठबंधन होगा. पश्चिम बंगाल में भी गठबंधन होगा. राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश और छत्‍तीसगढ़ में बसपा के साथ तालमेल की उम्‍मीद है. ये तो चुनाव पूर्व के गठबंधन हैं. चुनाव के बाद भी तो गठबंधन होंगे.

सवालः क्‍या महाराष्‍ट्र में शिवसेना और बिहार में जेडीयू के साथ गठबंधन की संभावना है?
जवाब: चुनाव पूर्व गठबंधन की संभावना नहीं है. शिवसेना के साथ जाने का सवाल ही नहीं उठता. जहां तक जेडीयू का सवाल है तो आप ऐसे व्‍यक्त‍ि के साथ कैसे जा सकते हैं, जो दो घंटे में अपना मन बदल लेता है. नीतीश मेरे बहुत अच्‍छे दोस्‍त हैं और उनसे मेरी बातचीत होती रही है, लेकिन उनका भरोसा नहीं किया जा सकता. अगर जेडीयू को बीजेपी के साथ जाना था, तो उन्‍हें चुनाव में जाकर जनता को यह बताना चाहिए था. लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया.

सवाल: अगर इतने बड़े पैमाने पर गठबंधन किया गया, तो 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए लड़ने को बमुश्किल 250 सीटें बचेंगी. क्‍या पार्टी इतनी कम सीटों पर लड़कर सिकुड़ नहीं जाएगी?
जवाब: सारी चीजें हालात पर निर्भर करती हैं. अभी कांग्रेस का लक्ष्‍य है कि पार्टी गठबंधन बनाकर चुनाव लड़े और किसी भी हालत में नरेंद्र मोदी को सत्‍ता से बाहर करे. जिन सीटों पर कांग्रेस कमजोर है, वे सहयोगियों को देना और जहां मजबूत हैं वहां सहयोगियों की मदद लेना ही इस समय कांग्रेस का धर्म है. गठबंधन में हम लेने के लिए ही नहीं हैं, बाकी दलों को पता होना चाहिए कि कांग्रेस देने के लिए भी तैयार है. जाहिर है कि हम 500 सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रहे होंगे, लेकिन कितनी सीटों पर लड़ेंगे, अभी से यह कहना ठीक नहीं है. लेकिन इतना जान लीजिये कि 2019 में कांग्रेस मोदी को सत्‍ता से बाहर कर देगी.

सवाल: तो इसका मतलब है कि कांग्रेस तीसरे मोर्चे का नेतृत्‍व स्‍वीकार करने को तैयार होगी?
जवाब: यह सब फालतू की बातें हैं. तीसरा मोर्चा, चौथा मोर्चा, पांचवां मोर्चा जैसी कोई चीज नहीं है. एक तरफ मोदी हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष, विपक्ष को मोदी को हराना है.

सवाल: गठबंधन तो ठीक है, लेकिन यह बताइए कि 2014 में कांग्रेस की छवि भ्रष्‍ट और मुस्लिम परस्‍त पार्टी की बन गई थी, उसे 2019 में कैसे बदलेंगे?
जवाब: 2019 का चुनाव इस बात पर होगा कि मोदी के वादों का क्‍या हुआ. जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव का मुद्दा हम थे, उसी तरह 2019 के चुनाव में एक ही मुद्दा होगा- नरेंद्र मोदी. नरेंद्र मोदी सरकार के झूठ बेनकाब करना हमारा काम है.

सवाल: और 2014 में आंध्र प्रदेश जैसा जो गढ़ ढह गया, उसकी भरपाई कैसे होगी?
जवाब: आंध्र प्रदेश का विभाजन करना कांग्रेस के लिए सुसाइड स्‍टेप रहा. वह हमारा सेल्‍फ गोल था. एक ऐसा राज्‍य जहां हमें 30 लोकसभा सीटें मिलती थीं, वहां हम साफ हो गए. लेकिन फिर भी यह कहूंगा कि इस फैसले से तेलंगाना को फायदा हुआ. आप जाकर देखिए जो विकास पहले हैदराबाद तक सीमित था, आज पूरे आंध्र और तेलंगाना में हो रहा है. राज्‍य को फायदा हुआ, लेकिन कांग्रेस को बहुत नुकसान हुआ.

सवाल: आपको लगता है कि कांग्रेस प्रचार के मामले में मोदी का मुकाबला कर पाएगी?
जवाब: मुझे यह बात मानने में कोई गुरेज नहीं है कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे अच्‍छे कम्‍युनिकेटर हैं. वे कम्‍युनिकेशन के मास्‍टर हैं. ऐसा कम्‍युनिकेशन कांग्रेस को नहीं आता. मोदी झूठ को सच बनाकर पेश कर सकते हैं, कांग्रेस झूठ नहीं बोल सकती. लेकिन जनता सच और झूठ का अंतर पहचान रही है. झूठ की उम्र ज्‍यादा नहीं होती.

सवाल: और बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह के रणनीतिक कौशल से आप कैसे निपटेंगे?
जवाब: खरीद-फरोख्‍त्त को आजकल मीडिया रणनीति कौशल कहने लगा है. लेकिन यह कितना कामयाब है यह पहले कर्नाटक और अब कैराना में सबको दिख गया है. अमित शाह सिर्फ झूठ बोलते हैं. उन्‍होंने जिंदगी में सिर्फ एक ही बार सच बोला है. और वह तब जब उन्‍होंने कहा था कि 15 लाख रुपए लाना चुनावी जुमला था.

सवाल: आखिरी सवाल, मोदी सरकार के चार साल को आप कैसे डिफाइन करेंगे?
जवाब: मोदी ने सरकार के लिए जुमला दिया था- मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट, लेकिन सचाई यह है कि मैक्सिमम मार्केटिंग, मिनिमम ट्रूथ. हिंदी में कहेंगे मार्केटिंग ज्‍यादा, सच्चाई कम.