नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर के लोगों को विशेष अधिकार प्रदान करने वाले अनुच्छेद 35-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई स्थगित कर दी. न्यायालय ने कहा कि उसकी तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है और वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या इस मामले को वृहद पीठ के पास भेजना होगा. प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट को देखना होगा कि क्या अनुच्छेद 35 ए संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ जाता है.Also Read - केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर ने कहा- ‘देश हित प्रथम’ की नीति पर बढ़ रहे हैं आगे

सीजेआई ने कहा, ”एक बार आप अनुच्छेद 35 ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हैं तो इसे पहले संवैधानिक पीठ के पास भेजना होगा. तीन सदस्यीय पीठ इसका फैसला करेगी. तीन सदस्यीय पीठ इस मामले को देख रही है.” उन्होंनें कहा, ”तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही है कि क्या अनुच्छेद 35 ए के मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाए.” Also Read - Latest Updates on Jammu Kashmir: ऐतिहासिक फैसले के बाद कश्मीर में CRPF के 8,000 और जवान भेजे गए

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश एएम खानविलकर की एक पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय एक पीठ को करनी है और इस पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ उपस्थित नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय ने 27 अगस्त को शुरू होने वाले सप्ताह में मामले की सुनवाई सूचीबद्ध की है. Also Read - कश्मीर के बंटवारे पर बोलीं महबूबा मुफ्ती- धारा 370 खत्म करना 'विनाशकारी' होगा

ये आर्टिकल 35ए
– साल 1954 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा संविधान में शामिल किया गया अनुच्छेद 35ए
– ये अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेष दर्जा देता है
– 35ए के तहत राज्य से बाहर के किसी भी व्यक्ति से शादी करने वाली प्रदेश की युवतियों को संपत्ति में अधिकार नहीं होगा
– इस प्रावधान के कारण जिन महिलाओं का संपत्ति से अधिकार समाप्त कर दिया गया है और उनके वारिसों को भी उसमें अधिकार नहीं दिया गया है.

अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती वाली याचिका पर सोमवार की सुनवाई रोकने की मांग को लेकर जम्मू कश्मीर सरकार 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट गई थी और उसने इसके लिए आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव का हवाला दिया था. सोमवार को सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 35-ए की वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने राज्य सरकार द्वारा मामले की सुनवाई स्थगित करने की मांग का विरोध किया.