Same Sex Marriage: क्या हिंदू मैरिज एक्ट के तहत समलैंगिक शादी जयाज है? अदालत अब इसकी सुनवाई करने जा रही है. दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) अगले साल 3 फरवरी को हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत समान-विवाह के पंजीकरण का विरोध करने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा और इसके पंजीकरण को धर्म-तटस्थ या धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत करने पर फैसला करेगा. मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह इसी तरह के मामलों के साथ याचिका पर सुनवाई करेगी और इसे 3 फरवरी के लिए सूचीबद्ध करेगी. इससे पहले पीठ लेस्बियन, गे, बायसेक्शुयल, ट्रांसजेंडर और क्वीर (LGBTQ प्लस) समुदाय से संबंधित व्यक्तियों द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विशेष हिंदू और विदेशी विवाह कानूनों के तहत समान-विवाह को मान्यता देने की मांग की गई थी.Also Read - बाप ने 17 साल की बेटी तांत्रिक को ‘दान’ की थी, हाईकोर्ट ने कहा, बेटी को संपत्ति नहीं, जिसे दान में दिया जाए

याचिकाकर्ता सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन द्वारा एडवोकेट शशांक शेखर के माध्यम से दायर हस्तक्षेप आवेदन में यह प्रस्तुत किया गया था कि ऐसी शादियों को या तो विशेष विवाह अधिनियम जैसे धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत पंजीकृत किया जाना चाहिए या मुस्लिम विवाह कानून और सिखों का आनंद विवाह अधिनियम जैसे सभी धार्मिक कानूनों के तहत अनुमति दी जानी चाहिए. याचिका में कहा गया है कि इसे धर्म-निरपेक्ष बनाया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ऐसे विवाहों के पंजीकरण पर आपत्ति दर्ज की है क्योंकि यह अधिनियम सीधे वेद और उपनिषद जैसे हिंदू धार्मिक ग्रंथों से लिया गया है, जहां एक विवाह को ‘केवल एक जैविक पुरुष और जैविक महिला के बीच अनुमति’ के रूप में परिभाषित किया गया है. Also Read - Assembly Elections 2022: 5 विधानसभा राज्यों के चुनाव टालने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर, ये है वजह

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि अगर ऐसे विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अलावा अन्य अधिनियमों जैसे विशेष विवाह अधिनियम और विदेशी विवाह अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं, तो कोई आपत्ति नहीं है. यदि इसे हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पंजीकृत होना चाहिए, तो यह सभी धर्मों के लिए होना चाहिए. इससे पहले कि अदालत हिंदुओं के लिए समान-विवाह के पक्ष में फैसला करे, उसे पहले उन प्रणालियों पर विचार करना चाहिए जहां विवाह केवल एक ‘नागरिक अनुबंध’ है जैसे निकाह. याचिकाकतार्ओं ने यह भी कहा कि 10,000 साल से अधिक के इतिहास वाले हिंदुओं के लिए समान-विवाह के पंजीकरण की अनुमति देने से पहले, इसे मुस्लिमों (1,400 वर्ष पुराने), ईसाई (2,000 वर्ष पुराने), पारसी (2,500 साल पुराना) जैसे नए धर्मों के साथ शुरू करना चाहिए. Also Read - Supreme Court का आदेश- ट्विन-टावर में घर खरीदारों को ब्याज सहित रकम वापस करे सुपरटेक, समय सीमा 28 फरवरी तक

30 नवंबर को, हाईकोर्ट ने एक याचिका पर देश में समलैंगिक विवाह की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग पर केंद्र की प्रतिक्रिया मांगी थी, जिसमें एक याचिकाकर्ता ने एलजीबीटी समुदाय की मान्यता को लगभग आठ प्रतिशत आबादी का गठन किया था. इससे पहले, केंद्र ने उच्च न्यायालय को यह भी बताया था कि एक ही लिंग के दो व्यक्तियों के बीच विवाह की संस्था की स्वीकृति किसी भी असंहिताबद्ध व्यक्तिगत कानूनों या किसी संहिताबद्ध वैधानिक कानूनों में न तो मान्यता प्राप्त है और न ही स्वीकार की जाती है.