
Arun Kumar
नमस्कार! मैं अरुण कुमार, फिलहाल India.com (Zee Media) में सीनियर सब एडिटर के रूप में स्पोर्ट्स डेस्क पर कार्यरत हूं. मैं पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं और ... और पढ़ें
बिहार विधानसभा चुनावों के रुझान और नतीजे देखकर RJD के नेतृत्व वाले महागठबंधन की पैरों तले जमीन खिसक गई है. वह नीतिश सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को महसूस कर सत्ता में अपनी वापसी के संकेत महसूस कर रही और नीतिश कुमार की सेहत का हवाला देकर उसके गठबंधन के नेता तेजस्वी यादव खुद को प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री बनने ख्वाब पूरा होता देख रहे थे. लेकिन जब ईवीएम से मतों की गिनती बाहर आई तो उसके लिए नतीजे चौंकाने वाले रहे. नीतिश कुमार के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन 200 सीटों के पार जाता दिख रहा है, जबकि 243 सीटों वाले इस राज्य में बहुमत का आंकड़ा सिर्फ 122 ही है. ऐसे में RJD और महागठबंधन के रणनीतिकारों की सोच और समझ पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
इससे पहले के दो विधान सभा चुनावों में RJD की पकड़ अच्छी खासी रही थी. 2015 के चुनावों में उसे 80 तो वहीं 2020 के चुनावों में 75 सीटें मिली थीं. लेकिन ताजा परिणामों में वह 75 तो दूर 50 के आंकड़े से भी बहुत पीछे दिख रही है. उसकी झोली में 25 से 30 सीटें भी मुश्किल से आती दिख रही हैं. इन परिणामों के बाद जब पार्टी और उसके नेता हार के कारण तलाशने शुरू करेंगे तो इसके मुख्य विलेन संजय यादव साबित हो सकते हैं, जो अब RJD के लिए नंबर 2 की भूमिका में दिख रहे थे.
इन चुनावों में वह तेजस्वी के मुख्य सलाहकार की भूमिका में दिखे और तेजस्वी भी उन पर आंखें मूंदकर भरोसा जताते रहे. संजय पूरे चुनावों में जगह-जगह तेजस्वी के साथ थे. चाहे यह उनकी यात्रा हो, चुनावी रैलियां हों, बड़े कॉन्क्लेव हों. संजय यादव बिहार के लिए बाहरी हैं और पार्टी में उनका बढ़ता कद देखकर पार्टी के कई नेताओं ने इसका विरोध किया था. नेता उन्हें बिहार की राजनीतिक समझ से दूर मानते थे. इसी के चलते तेजस्वी के परिजनों ने भी उनका विरोध किया था. तेजस्वी के भाई तेज प्रताप और रोहिणी ने भी इसका विरोध किया था. तेज प्रताप ने तो उन्हें ‘जयचंद’ तक कह दिया था. लेकिन तेज प्रताप पार्टी से क्या वह लालू परिवार से ही दूर हो गए.
बता दें संजय यादव बिहार के नहीं हैं वह मूल रूप से हरियाणा से आते हैं, जो महेंद्रगढ़ के रहने वाले हैं. उनकी बोलचाल में भी हरियाणवी लहजा झलकता है. वह पढ़े-लिखे नेता हैं, जिन्होंने कंप्यूटर साइंस और उसके बाद M. Sc. और उसके बाद MBA की पढ़ाई की है. वह डेटा एनालिसिस और मैनेजमेंट में माहिर हैं. राजनीति में आने से पहले वह एक निजी कंपनी में काम करते थे.
संजय और तेजस्वी पुराने दोस्त हैं. दोनों दिल्ली से ही एक-दूसरे को जानते हैं और कभी साथ में क्रिकेट खेला करते थे. 2012 के आसपास वह राजनीति में सक्रिय होने लगे. उनकी दिलचस्पी और राजनीतिक समझ देख तेजस्वी भी उनसे इंप्रेस हुए और उन्होंने राजनीतिक मामलों पर सलाह लेनी शुरू कर दी. तेजस्वी ने ही उन्हें पार्टी से फुल टाइम जु़ड़ने का ऑफर दिया था. इसके बाद संजय यादव पूर्ण रूप से पटना पहुंच गए और तेजस्वी की पार्टी को ही अपना ऑफिस बना लिया. 2024 में RJD ने उन्हें राज्य सभा भेजा.
बिहार में जब साल 2015 के चुनाव चल रहे थे, तब वह संजय सिंह ही थे, जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख के आरक्षण पर दिए एक बयान को पार्टी के राजनीतिक हितों के रूप में भुनाया था. तब RSS प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा पर बात कही थी. यह बात RJD के लिए मुद्दा बन सकती थी और संजय यादव ने इसे पार्टी के अजेंडा में लाकर पार्टी को लाभ दिलाया था. इन दिनों RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव भी रांची जेल में थे और ऐसे में संजय ने पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत कर ली.
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