श्रीनगर: जम्मू कश्मीर पुलिस ने ‘शूरा-ए-जिंदान’ (जेल के लिए सर्वोच्च परिषद) का भंडाफोड़ किया है और जेल नियमावली पूरी तरह से बहाल की है. अधिकारियों ने यहां यह जानकारी दी. ‘शूरा-ए-जिंदान’ शब्द का इस्तेमाल आतंकवादी जेल के अंदर अपने शासन के लिए करते हैं. लश्कर ए तैयबा के आतंकवादी नवीद जट के पिछले साल फरवरी में जेल से भागने के बाद दिलबाग सिंह के नेतृत्व के तहत जम्मू कश्मीर जेल विभाग ने श्रीनगर केंद्रीय कारागार से कट्टर आतंकवादियों को दूसरी जेलों में भेजने सहित जेलों को आतंकी गतिविधि मुक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए.

हाल ही में कारागार महानिदेशक पद से सेवामुक्त हुए सिंह ने कहा कि जेलों का पूर्ण विश्लेषण किया गया और यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि जेलों के अंदर आतंकवादियों के नियंत्रण को खत्म किए जाने तथा कानून का शासन लागू किए जाने की जरूरत है. हालांकि, उन्होंने इस सिलसिले में उठाए गए कदमों के बारे में और अधिक जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि हमने सिर्फ यह सुनिश्चित किया कि दुर्दांत आतंकवादी और अलगावावादियों को उन लोगों से अलग रखा जाए जो पहली बार जेल पहुंचे हैं और जिनके सुधार की गुंजाइश है. हालांकि, राज्य कारागार विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सिंह के प्रभार संभालने के बाद नियमित रूप से छापे मारे गए और तलाशी ली गई तथा कट्टर आतंकवादियों को जम्मू और उधमपुर स्थित अन्य जेलों में भेजा गया.

अधिकारियों ने बताया कि रैनवाड़ी पुलिस थाना में दो मामले दर्ज किए गए, जिनमें एक मामला जेल के अंदर ‘शूरा-ए-जिंदान’ के संचालित होने का है. दरअसल, इसमें कैदियों को बैरक और अन्य सुविधाएं आवंटित करने पर फैसला किया जाता है. उन्होंने बताया कि शूरा-ए-जिंदान कैदियों के चरमपंथ के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर उन्हें सुविधाएं मुहैया करता था, जिनमें उनकी पसंद का भोजन और अन्य सुविधाएं शामिल थे. उम्र कैद की सजा काट रहा आशिक हुसैन फकटू इस समूह का सुप्रीम कमांडर था. उन्होंने बताया कि कार्रवाई के बाद जेल परिसर के अंदर संचालित हो रही सभी निजी रसोइयों को अब बंद कर दिया गया है और सभी कैदी साझा लंगर में कतार में खड़े होते हैं जहां उन्हें भोजन परोसा जाता है. श्रीनगर केंद्रीय कारागार इससे पहले चरमपंथ का प्रसार करने वाला एक केंद्र बन गया था ,जिसे सिंह के कार्यकाल के दौरान ध्वस्त कर दिया गया.

दिसंबर 2017 में एक रिपोर्ट आई थी कि जेहाद पर उपदेश दिए जा रहे हैं…धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की अनदेखी की जा रही और कट्टरपंथी पहलुओं पर जोर दिया जा रहा है. इस तरह के धार्मिक उपदेशों का कैदियों पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है और खासतौर पर युवाओं में आतंकवाद की ओर जाने की प्रवृत्ति बढ़ती है या फिर उन्हें आतंकवादियों के लिए काम करने वाले के तौर पर भर्ती किया जाता है. रिपोर्ट में कहा गया था कि जेल, जिनके सुधार केंद्र के तौर पर काम करने की उम्मीद की जाती है, इसके बजाय कुछ खास चीजें दिमाग में डालने के लिए और आतंकियों की भर्ती के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं.