नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में सियासी उठापटक उफान पर है. एक और राज्य जहां कांग्रेस सत्ता गंवा सकती है. 18 साल पुराना कांग्रेस का साथ छोड़ ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) का बीजेपी (BJP) में जाना तय है. सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने पर  मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर और अफरातफरी देखने को मिल रही है. इस पूरे खेल और प्लान में ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्य केंद्र बने हुए हैं. देश में अगर किसी नेता की इस समय चर्चा है तो वह ज्योतिरादित्य सिंधिया ही हैं. Also Read - आज फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा दे सकते हैं सीएम कमलनाथ, विधायक दल की बैठक बुलाई  

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में कांग्रेस के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) का जाना बड़ा झटका है, क्योंकि कांग्रेस को मध्य प्रदेश में 15 साल बाद सत्ता में पहुंचाने में सिंधिया की भूमिका बेहद बड़ी थी. उन्होंने बीजेपी को हारने की कसम ली थी और हुआ भी कुछ ऐसा ही था, लेकिन कांग्रेस सरकार बनने के बाद भी सिंधिया को शायद वो सब नहीं मिल पाया, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. कांग्रेस का महासचिव तो बना दिया गया लेकिन सिंधिया को लग रहा था कि मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में उन्हें अलग-थलग कर दिया गया. वह इसी बात से नाराज थे. Also Read - फ्लोर टेस्ट कराए जाने के SC के आदेश पर कमलनाथ बोले- कानूनी परामर्श के बाद लेंगे फैसला

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ग्वालियर के ‘महाराजा’ (Maharaj of Gwalior) को अपने साथ किए गए ऐसे व्यवहार से तकलीफ हो रही थी. स्टेनफोर्ड हावर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर चुके इस नौजवान की राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन एक हादसे में पिता माधव राव सिंधिया की मौत के बाद विदेश की नौकरी छोड़ उन्हें राजनीति में उतरना पड़ता है. 30 साल की उम्र में चुनाव लड़ता है और गुना से सांसद बन जाता है. हम बात कर रहे हैं कांग्रेस के मध्यप्रदेश चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की.

गुना वह सीट है जहां माधव राव सिंधिया ने साल 1971 में चुनाव लड़ा था और अंत तक अपराजित रहे. 30 सितंबर साल 2001 को एक विमान हादसे में उनकी मौत हो गई. इसके बाद उनके राजनैतिक वारिस के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से लोकसभा चुनाव में उतरे और लगातार जीतते आए. 17 साल के अपने राजनैतिक करियर में ज्योतिरादित्य को तब और तकलीफ हुई जब वह 2019 में लोकसभा चुनाव हार गए.

कभी लाल बत्ती लगाने से किया था इंकार
राजघराने से ताल्लुक रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे, लेकिन उन्होंने लालबत्ती लगाने से मना कर दिया. वह कई बार बता चुके हैं कि 21वीं सदी के भारत में वह महाराज की किसी भी छवि में यकीन नहीं रखते हैं.

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इस वजह से सिंधिया स्कूल में नहीं पढ़े
ज्योतिरादित्य का जन्म मुंबई में हुआ और 5वीं तक की पढ़ाई वह मुबंई के कैंपियन स्कूल में ही पूरी की. 6वीं में वह दून स्कूल चले गए. इस दौरान ये सवाल उठने लगा कि ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में वह क्यों नहीं पढ़ रहे हैं. इस पर उनके पिता माधवराव सिंधिया ने जवाब दिया था कि सिंधिया स्कूल में पढ़ने की वजह से उन्हें न चाहते हुए भी वीआईपी ट्रीटमेंट मिलने लगता, जिससे उनके पूरे व्यक्तित्व पर असर पड़ता. बताया जाता है कि दून स्कूल में भी कहा गया था कि ज्योतिरादित्य से दूसरे बच्चों की तरह ही व्यवहार किया जाए.

ज्योतिरादित्य ने की नौकरी
बताया जाता है कि ज्योतिरादित्य को स्कूल के दिनों से ही भाषण, क्रिकेट, कार रेसिंग, शूटिंग और आर्चीर में इंट्रेस्ट था. 12वीं के बाद माधव राव सिंधिया चाहते थे कि ज्यातिरादित्य कैम्ब्रिज में पढ़ने जाए, लेकिन ज्योतिरादित्य को अमेरिका पसंद आया. इसके बाद ज्योतिरादित्य ने स्टेनफोर्ड और हावर्ड से एमबीए किया. पढ़ाई के बाद ज्योतिरादित्य ने अमेरिका में ही साढ़े चार साल लिंच, संयुक्त राष्ट्र और मार्गेन स्टेनले में काम किया.

प्रियदर्शनी से की थी शादी
साल 1994 में ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रियदर्शनी राजे के साथ शादी हुई. प्रियदर्शनी राजनीति में भी ज्योतिरादित्य का पूरा साथ देती हैं. दोनों का एक बेटा महा आर्यमण और बेटी अनन्या राजे हैं.