नई दिल्ली. कर्नाटक चुनाव के नतीजे लगभग आ गए हैं. राज्य में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. हालांकि, ये चुनाव बीजेपी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के की बदौलत ज्यादा जीता है, लेकिन येदियुरप्पा को भी कहीं से खारिज नहीं किया जा सकता है. लिंगायत समुदाय से आने वाले येदियुरप्पा एक ऐसे चेहरे के रूप में हैं, जिसके बल पर दक्षिण में बीजेपी को एक बार फिर जीत मिलती दि्ख रही है. राज्य में यदि बीजेपी की सरकार बनती है तो येदियुरप्पा तीसरी बार सीएम बन सकते हैं.

27 फरवरी 1943 को सामान्य लिंगायत परिवार में जन्मे येदियुरप्पा शुरुआती दौर से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे. साल 1972 में उन्हें शिकारीपुरा तालुका जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया. इमरजेंसी के दौरान वह जेल गए और वहीं से उन्होंने राजनीति में संघर्ष सीखा.

साल 1988 में वह वह पहली बार कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बने. साल 1983 में वह शिकारीपुर से विधानसभा पहुंचे. बता दें कि अभी तक वह 6 बार इसी सीट से चुनाव जीत चुके हैं. साल 1994 और 2004 में वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने. साल 2006-7 में वह जेडीएस के साथ बीजेपी के हुए एक समझौते में डिप्टी सीएम बने. इस समझौते के मुताबिक, जेडीएस और बीजेपी का 20-20 महीने सीएम बनना था. लेकिन बीजेपी का टर्म आने पर कुमारस्वामी ने समर्थन वापस ले लिया.

पहली बार 7 दिन के लिए बने थे सीएम
येदियुरप्पा 12 नवंबर 2007 को पहली बार सीएम बने थे. लेकिन 19 नवंबर को ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. साल 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला और येदियुरप्पा एक बार फिर राज्य के सीएम बने. उनका ये मुख्यमंत्रीत्व काल काफी विवादित रहा और तीन साल बाद खनन घोटाले में फंसने पर उनकी कुर्सी चली गई.

लिंगायत फैक्टर का असर
सीएम की कुर्सी जाने के बाद येदियुरप्पा बीजेपी से अलग हो गए. ऐसे में लगा कि वह पूरे लिंगायत फैक्टर के साथ अपने बल पर राजनीति करेंगे. लेकिन, बीजेपी को यह समझते देर नहीं लगी कि येदियुरप्पा के बिना राज्य में उसका कोई जनाधार नही रह जाएगा. ऐसे में 2018 में भी बीजेपी ने उन्हें अपना सीएम पद का उम्मीदवार बनाया है.