नई दिल्ली. कर्नाटक विधानसभा का चुनाव जितना रोमांचक रहा, उससे कहीं ज्यादा रोमांच इन चुनावों के परिणाम को लेकर देखा जा रहा है. राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनी भाजपा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. वहीं, विपक्षी कांग्रेस ने भी तीसरी पार्टी जेडीएस के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. अब राज्य की सियासत की स्थिति कुछ वैसी ही बन गई है, जैसी 2017 में गोवा चुनावों के बाद बनी थी. फर्क सिर्फ इतना है कि अभी जिस स्थिति में भाजपा है, गोवा में यह स्थान कांग्रेस का था. लिहाजा, हमेशा की तरह हमलावर रहने वाली भाजपा, यहां विपक्षी कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के आगे बेबस है. कांग्रेस, भाजपा के साथ उसी की भाषा में बात कर रही है. वह उन्हीं अरुण जेटली के सुप्रीम कोर्ट में दिए तर्क से खेल रही है, जिसको लेकर गोवा चुनावों के समय जेटली ने कांग्रेस पर वार किया था. गोवा चुनाव में कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद जेटली ने सुप्रीम कोर्ट में भाजपा और सहयोगी पार्टियों के गठबंधन के पक्ष में दलीलें दी थीं. कांग्रेस उन्हीं दलीलों को कर्नाटक में भाजपा के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है. Also Read - पश्चिम बंगाल में बोले जेपी नड्डा, बहुत जल्द लागू होगा नागरिकता संशोधन कानून

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गोवा में क्या हुआ था

भाजपा चाहकर भी कर्नाटक में पैदा हुई राजनीतिक परिस्थिति पर टीका-टिप्पणी नहीं कर रही, क्योंकि कुछ ऐसी ही स्थितियां गोवा के चुनावों के दौरान उसने कांग्रेस के लिए खड़ी कर दी थी. भाजपा के नेता भले कर्नाटक में पैदा हुई स्थितियों को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगा लें, लेकिन दुनिया जानती है कि गोवा में भाजपा ने खुद ऐसा ही ‘नाटक’ किया था. 2017 में 40 सदस्यीय गोवा विधानसभा के चुनाव में 17 सीटें जीतने वाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. भाजपा को महज 13 सीटें ही मिल पाई थीं. लेकिन भाजपा ने गोवा के स्थानीय दो दलों को मिलाकर बहुमत जुटा ली और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया. कांग्रेस भाजपा से ज्यादा सीटें रहते हुए भी समय पर राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर पाई और अंततः भाजपा ने गोवा की सत्ता कांग्रेस से छीन ली. बाद में कांग्रेस के विधायक दल के नेता चंद्रकांत कवलेकर इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट चले गए.

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सुप्रीम कोर्ट रहा गवर्नर का साथ

सुप्रीम कोर्ट में 13 मार्च 2017 को इस मामले की सुनवाई हुई. कांग्रेस के चंद्रकांत कवलेकर ने गोवा के गवर्नर के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी. मामले की सुनवाई तत्कालीन चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर.के. अग्रवाल की बेंच ने की. कोर्ट ने कांग्रेस की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वे समय पर गवर्नर के पास नहीं पहुंचे. मामले में कांग्रेस की ओर से वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी थी कि गवर्नर ने सबसे बड़ी पार्टी को सरकार गठन के लिए नहीं बुलाया. सिंघवी ने कहा था कि यदि कोई चुनाव-पूर्व गठबंधन नहीं था तो गवर्नर को सबसे पहले कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका देना चाहिए था. लेकिन कोर्ट ने ये दलीलें खारिज कर दी. कोर्ट ने इस मामले पर अपना निर्णय देते हुए कहा था, ‘अगर सबसे बड़ी पार्टी के पास बहुमत है तो गवर्नर के सामने कोई संशय नहीं होता. लेकिन अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला हो, तब राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार गठन के लिए बुला सकते हैं. लेकिन इस बीच अगर किसी और पार्टी ने अपने समर्थन में पर्याप्त विधायकों की लिस्ट गवर्नर के सामने रख दी, तब की स्थिति में कोई भी निर्णय लेना गवर्नर का विशेषाधिकार है.’ तीन जजों की बेंच ने सुनवाई के दौरान कांग्रेस को फटकार लगाते हुए कहा था, ‘उस वक्त आप कहां थे जब भाजपा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया.’

जेटली ने दी थी गवर्नर के पक्ष में दलील

गोवा विधानसभा चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चले मामले में भाजपा की तरफ से वकील अरुण जेटली थे. उन्होंने गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा के सरकार गठन के लिए भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को पहले बुलाने का समर्थन किया था. जेटली ने कोर्ट में पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी को मार्च 1998 में सरकार बनाने के लिए बुलावा भेजने का उदाहरण दिया था. जेटली ने पूर्व राष्ट्रपति की बातों को दोहराते हुए दलील दी थी, ‘जब किसी एक पार्टी या चुनाव पूर्व गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राज्य के प्रधान को यह अधिकार है कि वह पहले सबसे बड़ी पार्टी के नेता या सबसे बड़े गठबंधन, जिसके पास सदस्यों की संख्या ज्यादा है, उसे सरकार गठन के लिए बुलाए.’ आज कर्नाटक में गोवा जैसी ही स्थिति आ गई है और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने सरकार गठन का दावा पेश कर दिया है. ऐसे में भाजपा को जेटली द्वारा कोर्ट में दी गई यह दलील भारी पड़ रही होगी.

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