नई दिल्ली. कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस पूरे चुनाव अभियान के दौरान भाजपा को कड़ी टक्कर देती नजर आ रही थी. लेकिन आखिर में परिणाम भाजपा के पक्ष में ही आए. भाजपा ने एक बार फिर साबित किया कि वह ‘अजेय’ है. जिस तरह से उत्तर-पूर्व के राज्यों में भाजपा का ‘कमल’ खिला या उससे पहले गुजरात और हिमाचल प्रदेश में पार्टी ने जीत दर्ज की, उसके बाद दक्षिण में पार्टी की यह धमाकेदार जीत, कांग्रेस के लिए जमीन दिखाने वाली है. पिछले कुछ चुनावों के मुकाबले कांग्रेस के लिए कर्नाटक का विधानसभा चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण था.

यह चुनाव पार्टी की देश में पहचान बनाए रखने के लिए जरूरी था. कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार राहुल गांधी की हैसियत का लेखा-जोखा पेश करने वाला था. इसके अलावा 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के मुकाबले विपक्ष में सबसे बड़े दल की हैसियत बरकरार रखने के लिए भी जरूरी था. लेकिन, कर्नाटक की हार ने सभी चुनाव पूर्व संकेतों को किनारे कर दिया है. कांग्रेस फिर से पराजित-पार्टी और इसके अध्यक्ष राहुल गांधी हारे हुए योद्धा साबित हुए हैं. विधानसभा चुनाव की इस हार के कारणों पर कांग्रेस पार्टी के नेता विश्लेषण करेंगे, लेकिन इससे पहले आइए जानते हैं पार्टी की चुनावी हार के ये 5 कारण.

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लिंगायत मुद्दा
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने भाजपा के परंपरागत वोट, लिंगायत समुदाय में सेंध लगाने की सधी हुई रणनीतिक चाल चली. उसने लिंगायत को अलग संप्रदाय बनाने का चुनावी दांव आजमाया. पार्टी का लक्ष्य था कि इससे थोड़ा-बहुत ही सही, लिंगायत समुदाय के कुछ वोट कांग्रेस के पक्ष में जाएंगे. कांग्रेस के इस दांव से भाजपा के सीएम पद के दावेदार बी.एस. येद्दीयुरप्पा, जो कि खुद लिंगायत समुदाय से आते हैं, भी कुछ दिनों के लिए प्रभावित दिखे, लेकिन कांग्रेस का यह चुनावी तिकड़म, उसे वोट नहीं दिला सका. कांग्रेस तमाम गणित भिड़ाकर भी, लिंगायतों को अपने पक्ष में करने में नाकाम रही.

टीपू की जयंती
विधानसभा चुनाव से करीब तीन साल पहले से कांग्रेस सरकार ने राज्य में मैसूर राज्य के पूर्व शासक रहे टीपू सुल्तान की जयंती मनाने की परंपरा की शुरुआत की. टीपू की जयंती शुरुआत से ही विवादों में रही. भाजपा जहां टीपू सुल्तान को देश का गद्दार और हिन्दू-विरोधी साबित करती रही, वहीं कांग्रेस इसके जरिए अल्पसंख्यकों को साधने की रणनीति के तहत उसे इतिहास का नायक बताती रही. विधानसभा चुनाव के प्रचारों के दौरान भी भाजपा के नेता टीपू जयंती को लेकर कांग्रेस पर हमलावर रहे. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने इसको लेकर कहा भी था कि कांग्रेस हनुमान जयंती नहीं मनाएगी, लेकिन टीपू जयंती का आयोजन करेगी. अंततः यह मुद्दा भी कांग्रेस के विपक्ष में गया.

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कन्नड़ गौरव
विधानसभा चुनाव में हार के कारणों में कन्नड़ गौरव से ऐन पहले, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कन्नड़ गौरव अभियान का श्रीगणेश किया. इसके तहत कर्नाटक राज्य का अलग झंडा लॉन्च करने की कवायद और हिन्दी भाषा के मुकाबले कन्नड़ को महत्व देने को अभियान के शक्ल में अपनाया गया. पीएम नरेंद्र मोदी के चुनावी दौरों से पहले सिद्धारमैया ने खुद को ‘कन्नडिगा’ यानी कर्नाटक के प्रति समर्पित कहते हुए, पीएम से भी कन्नडिगा होने की अपील की. उन्होंने कर्नाटक के ध्वज को केंद्र से मंजूर करने की मांग की. लेकिन कांग्रेस के इस चुनावी दांवों को भाजपा ने अपने ‘एक देश’ की अवधारणा से ‘धोकर’ रख दिया. पूरे चुनाव के दौरान कन्नड़ गौरव अभियान कभी भी प्रमुख मुद्दे के रूप में नहीं उभरा.

चुनाव प्रबंधन
2014 में भाजपा के केंद्र में सत्ता हासिल करने के बाद (या पहले से भी) चुनाव प्रबंधन के मामले में इस पार्टी ने हर बार, हर चुनाव में साबित किया है कि इस मामले में कोई भी पार्टी उसके आस-पास नहीं फटकती. कर्नाटक चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति, कांग्रेस के संपूर्ण अभियान के मुकाबले ज्यादा कारगर साबित हुई. भाजपा ने विभिन्न राज्यों की तरह ही कर्नाटक चुनाव में साबित कर दिखाया कि वह चुनाव के दौरान जनता के मूड को अच्छी तरह समझती है. बूथ मैनेजमेंट की बात हो या मीडिया की सुर्खियां बटोरने की कला, भाजपा कहीं भी कांग्रेस से 19 नहीं, बल्कि 21 ही साबित हुई.

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मोदी मैजिक
‘मोदी मैजिक’ एक फैक्टर है, जिससे पिछले कई चुनावों में कोई भी दल पार नहीं पा सका है. पीएम नरेंद्र मोदी की चुनाव रैलियां या सभाएं, कांग्रेस या किसी अन्य दल की दो-चार दस सभाओं पर भारी पड़ती है. पीएम मोदी के चुनावी हमले सह पाने में हाल के दिनों में कोई भी पार्टी नाकाम रही है. यह पीएम मोदी का ही प्रभाव है कि कर्नाटक के चुनाव में भ्रष्टाचार के आरोपी रहे भाजपा के सीएम पद के दावेदार येद्दीयुरप्पा और रेड्डी बंधुओं को टिकट देने के मामले पर कांग्रेस के लगातार हमलों के बावजूद, मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में ही वोट दिया. मतदाताओं को पीएम मोदी का सिद्धारमैया को ‘सीधा रुपैया’ कहना याद रहा, लेकिन उन्हें खनन माफिया रेड्डी बंधुओं की कारस्तानी याद नहीं आई.