बेंगलुरूः चुनावी राज्य कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने सोमवार को कैबिनेट की बैठक में लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने के सुझाव को मंजूरी दे दी. चुनावों से पहले यह फैसला कर्नाटक की राजनीति बदल सकता है. बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार बीएस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. 2013 में बीजेपी ने येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाया तो लिंगायत समाज ने बीजेपी को वोट नहीं दिया. कांग्रेस फिर से सत्ता में लौट आई.कर्नाटक सरकार के इस फैसले से राज्य में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. बीजेपी ने कर्नाटक सरकार के इस फैसले का विरोध किया है. Also Read - उपमुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद सचिन पायलट ने किया पहला ट्वीट- 'सत्य परेशान हो सकता है पराजित नही'

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राज्य की सिद्धारमैया सरकार ने जस्टिस नागमोहन दास की रिपोर्ट को मंजूरी देते हुए लिंगायत धर्म बनाने की सिफारिश की है. कर्नाटक सरकार इसके लेकर केंद्र को चिट्ठी लिखेगी. में मंत्री बी पाटिल ने कहा कि कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म बनाने के लिए जस्टिस नागमोहन दास की रिपोर्ट को मंजूर कर लिया है. लिंगायत बासवेश्वरा की विचारधारा को माने वाले हैं. हम भारत सरकार को इस बारे में लिखेंगे. Also Read - राजस्थान की सियासी जंग में कूदीं उमा भारती, बोलीं- राजेश पायलट का बेटा है सचिन, मेरे भाई स्वाभिमानी थे

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18 प्रतिशत है आबादी

कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के लोगों की संख्या करीब 18 प्रतिशत है. गौरतलब है कि लिंगायत संतों के एक समूह ने रविवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से मुलाकात कर आधिकारिक कमेटी की रिपोर्ट लागू करने का उनसे अनुरोध किया था. रिपोर्ट में उनके समुदाय को एक अलग धार्मिक एवं अल्पसंख्यक दर्जा देने की सिफारिश की गई है. वर्तमान में लिंगायत समाज को कर्नाटक की अगड़ी जाति माना जाता है, लेकिन तकनीकी रूप से ये अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं. कर्नाटक की आबादी में 18 फीसदी लिंगायत समुदाय के लोग हैं. पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की अच्छी खासी आबादी है. पिछले साल बीदर जिले में लिंगायतों ने बड़ी जनसभा कर खुद को अलग धर्म की मान्यता देने की मांग की थी.

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कौन हैं लिंगायत

अलग धर्म की मांग करने वाले लिंगायत आखिर कौंन हैं? क्यों यह समुदाय राजनीतिक तौर पर इतनी अहमियत रखता है? दरअसल भक्ति काल के दौरान 12वीं सदी में समाज सुधारक बासवन्ना ने हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था. उन्होंने वेदों को खारिज कर दिया और मूर्तिपूजा की मुखालफत की. उन्होंने शिव के उपासकों को एकजुट कर वीरशैव संप्रदाय की स्थापना की. आम मान्यता ये है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही होते हैं. लेकिन लिंगायत लोग ऐसा नहीं मानते. उनका मानना है कि वीरशैव लोगों का अस्तित्व समाज सुधारक बासवन्ना के उदय से भी पहले से था. वीरशैव भगवान शिव की पूजा करते हैं. वैसे हिंदू धर्म की जिन बुराइयों के खिलाफ लिंगायत की स्थापना हुई थी आज वैसी ही बुराइयां खुद लिंगायत समुदाय में भी पनप गई हैं.

एक दशक पुरानी मांग

समुदाय के भीतर लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग मान्यता दिलाने की मांग समय-समय पर होती रही है. लेकिन पिछले दशक से यह मांग जोरदार तरीके से की जा रही है. 2011 की जनगणना के वक्त लिंगायत समुदाय के संगठनों ने अपने लोगों के बीच यह अभियान चलाया कि वे जनगणना फर्म में अपना जेंडर न लिखें. राजनीतिक विश्‍लेषक लिंगायत को एक जातीय पंथ मानते हैं, न कि एक धार्मिक पंथ. अस्सी के दशक की शुरुआत में रामकृष्ण हेगड़े ने लिंगायत समाज का भरोसा जीता. हेगड़े की मृत्यु के बाद बीएस येदियुरप्पा लिंगायतों के नेता बने.