चेन्नई। दक्षिण भारत की कम से कम 50 फिल्मों की कहानियां और संवाद लिखने वाले करुणानिधि की पहचान एक ऐसे राजनीतिज्ञ के तौर पर थी जिसने अपनी लेखनी से तमिलनाडु की तकदीर लिखी. तेज तर्रार, बेहद मुखर करुणानिधि ने जब द्रविड़ राज्य की कमान संभाली तो उन्होंने कई दशक तक रुपहले पर्दे पर अपने साथी रहे एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता को राजनीति में पछाड़ दिया. उनके अंदर कला और राजनीति का यह मिश्रण शायद थलैवर (नेता) और कलैनार (कलाकार) जैसे उन संबोधनों से आया जिससे उनके प्रशंसक उन्हें पुकारते थे. Also Read - Cyclone Nivar: तेजी से बढ़ रहा चक्रवाती तूफान निवार, इन राज्यों में मचा सकता है भारी तबाही, देखें VIDEO

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दिल्ली तक थी करुणानिधि की धमक Also Read - Coronavirus Crisis in India: देश में कोरोना की कहीं दूसरी तो कहीं तीसरी लहर का प्रकोप, यहां देखें किस राज्य में कितने मामले

करुणानिधि का राजनीति प्रभाव केवल उनके राज्य तक ही सीमित नहीं था. उनकी ताकत की धमक राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक थी और इसी के बल पर उन्होंने कभी कांग्रेस के साथ तो कभी भाजपा के साथ गठबंधन करके उसे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. हालांकि इसके लिए उन्हें कटु आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा. आलोचकों ने उन्हें मौकापरस्त तक कह दिया. फिलहाल तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक की सरकार है, लेकिन करुणानिधि ने अपने सियासी दांवपेंचों से हलचल बनाए रखी. चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस, दोनों बड़े दल उन्हें अपने साथ बनाए रखना चाहते थे.

काला चश्मा बन गई थी करुणानिधि की पहचान, 46 साल बाद ही इसे बदला

मुथुवेल करुणानिधि के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1938 में तिरूवरूर में हिंदी विरोधी प्रदर्शन के साथ शुरू हुई. तब वह केवल 14 साल के थे. इसके बाद सफलता के सोपान चढ़ते हुए उन्होंने पांच बार राज्य की बागडोर संभाली.

द्रविड़ आंदोलन का सबसे भरोसेमंद चेहरा बने

ई वी रामसामी ‘पेरियार’ और द्रमुक संस्थापक सी एन अन्नादुरई की समानाधिकारवादी विचारधारा से बेहद प्रभावित करुणानिधि द्रविड़ आंदोलन के सबसे भरोसेमंद चेहरा बन गए. इस आंदोलन का मकसद दबे कुचले वर्ग और महिलाओं को समान अधिकार दिलाना था, साथ ही यह आंदोलन ब्राह्मणवाद पर भी चोट करता था.

नहीं रहा भारतीय राजनीति का ‘कलाकार’, 94 साल की उम्र में करुणानिधि का निधन

फरवरी 1969 में अन्नादुरई के निधन के बाद वी आर नेदुनचेझिएन को मात देकर करुणानिधि पहली बार मुख्यमंत्री बने. उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में एम जी रामचंद्रन ने अहम भूमिका निभाई थी. वर्षों बाद हालांकि दोनों अलग हो गए और एमजीआर ने अलग पार्टी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (अन्नाद्रमुक) की स्थापना की.

6 दशक तक रहे विधायक

करुणानिधि 1957 से छह दशक तक लगातार विधायक रहे. इस सफर की शुरुआत कुलीतलाई विधानसभा सीट पर जीत के साथ शुरू हुई तथा 2016 में तिरूवरूर सीट से जीतने तक जारी रही. सत्ता संभालने के बाद ही करुणानिधि जुलाई 1969 में द्रमुक के अध्यक्ष बने और अंतिम सांस लेने तक वह इस पद पर बने रहे.

(भाषा इनपुट)