चेन्नई। शहर के एक अस्पताल में पिछले दस दिन से भर्ती द्रमुक अध्यक्ष एम. करुणानिधि का निधन हो गया है. वह 94 साल के थे. करुणानिधि को रक्तचाप की समस्या के बाद 28 जुलाई को अस्पताल में भर्ती कराया गया था. हालांकि रक्तचाप की समस्या पर डॉक्टरों ने पार पा लिया, लेकिन स्वास्थ्य में गिरावट के कारण वह अस्पताल में भर्ती थे. स्वास्थ्य में गिरावट की सूचना के साथ ही बड़ी संख्या में द्रमुक कार्यकर्ता अस्पताल के बाहर पहुंच गए. यहां पर पुलिसबल का भी बंदोबस्त किया गया था. कई समर्थकों को उनके लिए रोता देखा गया. Also Read - VIDEO: कई दलों के सांसदों ने राज्‍यों को GST के भुगतान के लिए गांधी प्रतिमा के सामने किया प्रदर्शन

कलैंगर के नाम से थे मशहूर Also Read - डीएमके सहित कई दलों ने की 'नीट परीक्षा 2020' को रद्द करने की मांग, पार्टी नेताओं ने संसद परिसर में दिया धरना

मुथुवेल करुणानिधि का जन्म 1924 में नागापट्टिनम जिले के थिरिक्कुवलाई में हुआ था. वह कलैंगर (कलाकार) के नाम से लोकप्रिय थे. वह 1969 से 2011 के बीच पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे. वह 10 बार द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) के अध्यक्ष रहे और द्रविड़ आंदोलन में उनकी प्रमुख भूमिका रही. उन्होंने द्रविड़ों के आत्मसम्मान की लड़ाई प्रभावी तरीके से लड़ी. Also Read - PM मोदी की तारीफ करने पर डीएमके ने MLA को किया निलंबित, सेल्वम पहुंचे बीजेपी ऑफिस

राजनीति में कदम रखने से पहले करुणानिधि ने तमिल फिल्म इंडस्ट्री में एक स्क्रीनराइटर के तौर पर काम किया. उन्होंने तमिल साहित्य में भी योगदान दिया और कई कहानियां, नाटक, उपन्यास और कई स्मृतियां भी लिखीं. उनका रुझान पूरी तरह राजनीति की तरफ था.

राजनीति में कदम

करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में ही एक तरह से राजनीति में कदम रख दिया था. उस दौर में वह जस्टिस पार्टी के अलागिरस्वामी के भाषण से बहुत प्रभावित हुए थे और हिंदी विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया था. उन्होंने स्थानीय स्तर पर एक लोकल यूथ संगठन भी बनाया था. उन्होंने सदस्यों के अपने हाथ से लिखा अखबार मनावर नेसान भी बांटा. इसके बाद उन्होंने द्रविड़ आंदोलन का पहला स्टूडेंट विंग का भी गठन किया. कलाकुडी का नाम डालमियापुरम करने के विरोध में करुणानिधि ने बड़ा विरोध आंदोलन चलाया जिसमें 2 लोगों की मौत भी हुई थी. इस मामले में उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी. यहां से उन्हें व्यापक चर्चा भी मिली.

राजनीति में तेजी से उभार

1957 में कुलीथलाई से विधानसभा चुनाव जीतक 33 साल की उम्र में करुणानिधि विधानसभा पहुंचे. 1961 में वह डीएमके के खजांची बने. 1962 में विपक्ष के उपनेता बने. 1967 में तमिलनाडु में डीएमके की सरकार बनने के बाद वह मंत्री बने. जब 1969 में अन्नादुरई का निधन हुआ तो वह न सिर्फ तमिलनाडु के सीएम बने बल्कि पेरियार के निधन से खाली रहे डीएमके नेता भी बनाए गए. अन्नादुरई पार्टी के महासचिव ही थे. हालांकि, इसके बाद 1987 तक करुणानिधि को एडीएमके के एमजी रामचंद्रन से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. हालांकि, वह अपने सियासी करियर में एक भी चुनाव नहीं हारा. वह 1957 से 2016 के बीच 13 बार विधायक चुने गए.

जयललिता से मिली कड़ी चुनौती 

1980 में उनकी सरकार को केंद्र ने कानून व्यवस्था के सवाल पर बर्खास्त कर दिया था. 1996 में वह पूर्ण बहुमत हासिल कर दोबारा सीएम बने. लेकिन 2001 में उनकी पार्टी जयललिता की  AIADMK से चुनाव हार गई. लेकिन 2006 में उन्होंने दोबारा वापसी करते हुए जयललिता को हरा दिया और फिर सीएम बने. लेकिन 2011 में दोबारा जयललिता के हाथों उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा.