केरल बाढ़: पानी कम हुआ तो 'सहायता' पर शुरू हुई राजनीति, विदेशी मदद पर उलझीं सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियां

केरल माकपा प्रदेश सचिव के. बालकृष्णन ने कहा कि केंद्र को परंपरा में बदलाव करना चाहिए ताकि केरल विदेशों से सहायता प्राप्त कर सके.

Published date india.com Updated: August 23, 2018 9:13 PM IST
केरल बाढ़: पानी कम हुआ तो 'सहायता' पर शुरू हुई राजनीति, विदेशी मदद पर उलझीं सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियां

कोच्चि/हैदराबाद/नई दिल्ली: कांग्रेस और माकपा सहित विपक्षी दलों ने गुरुवार को केंद्र पर निशाना साधा और कहा कि वह वर्षा प्रभावित केरल के लिए विदेशी सहायता स्वीकार करने में बाधाएं हटाये जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 700 करोड़ रुपये की पेशकश शामिल है. वहीं सरकार ने अपने रुख को उचित ठहराया.

केंद्रीय मंत्री अल्फोन्स कन्ननथनम ने केंद्र के निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि बाढ़ प्रभावित राज्य के पुनर्वास के लिए विदेशी सहायता अस्वीकार करके सरकार ने प्राकृतिक आपदाओं में ऐसी सहायता स्वीकार नहीं करने की उस 14 वर्ष की परंपरा का पालन किया है जो उसे पूर्ववर्ती सरकार से ‘‘विरासत’’ में मिली.

इस मुद्दे पर केरल माकपा प्रदेश सचिव के. बालकृष्णन ने कहा कि केंद्र को उस परंपरा में बदलाव करना चाहिए ताकि केरल विदेशों से सहायता प्राप्त कर सके. उन्होंने फेसबुक पर लिखे एक पोस्ट में यूएई की सहायता की पेशकश अस्वीकार करने के केंद्र के निर्णय को ‘‘गलत’’ बताया.

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कांग्रेस ने इस निर्णय को ‘‘निराशाजनक’’ बताया. कांग्रेस महासचिव एवं केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने नियमों में बदलाव का आग्रह किया है जिससे बाढ़ प्रभावित राज्य के पुनर्निर्माण में विदेशी सहायता प्राप्त करने में आसानी हो. उन्होंने कहा, ‘‘निर्णय केरल के लोगों के लिए काफी निराशाजनक है. नियम ऐसे होने चाहिए जिससे लोगों के कष्ट समाप्त हों.’’ उन्होंने पत्र में लिखा, ‘‘विदेशी सहायता स्वीकार करने में यदि कोई बाधा है तो कृपया उस पर गंभीरता से गौर करें और उसमें उचित बदलाव लायें.’’

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने कहा कि यदि केंद्र संयुक्त अरब अमीरात की केरल के लिए 700 करोड़ रुपये की पेशकश ठुकराना चाहता है तो उसे इस दक्षिणी राज्य को बाढ़ राहत अभियानों के लिए 2600 करोड़ रुपये की अंतरिम सहायता देनी चाहिए. केरल में एलडीएफ सरकार के दूसरे सबसे बड़े घटक भाकपा के महासचिव सूरवरम सुधाकर रेड्डी ने केंद्र पर राष्ट्रीय आपदा की घड़ी में विदेशी सहायता के मुद्दे पर ‘झूठी प्रतिष्ठा’ पर खड़े रहने का भी आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि जब कोई देश प्राकृतिक आपदा का सामना करता है तो यह सामान्य परिपाटी है कि दूसरे देश सहायता की पेशकश करते हैं. उन्होंने याद किया कि भारत ने अतीत में ऐसी स्थितियों में नेपाल और बांग्लादेश की मदद की थी और पाकिस्तान को भी भूकंप के समय ऐसी पेशकश की थी. रेड्डी ने कहा, ‘‘ऐसी स्थिति में, हम यूएनओ और यूएई से (सहायता) स्वीकार कर सकते हैं….जो भी बिना शर्त मदद करता है, हमें उसे स्वीकार करना चाहिए.’’

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संयुक्त अरब अमीरात और थाईलैंड जैसे देशों द्वारा केरल के लिए सहायता की पेशकश अस्वीकार करने के केंद्र के रुख को उचित ठहराते हुए अल्फोंस ने कहा कि 2004 में विनाशकारी सुनामी के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विदेशी सहायता स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. वर्तमान सरकार ने उसी नीति के तहत यह फैसला किया है. उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “सुनामी के बाद दिसम्बर 2004 में मनमोहन सिंह सरकार ने एक नीतिगत फैसला किया था और पिछले 14 वर्षों से यह नीति जारी है. हमने इसी नीति को अपनाया है.”

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इससे पहले वित्त मंत्री टी.एम. थॉमस इसाक ने यूएई सरकार की पेशकश पर केंद्र सरकार के ‘‘कथित नकारात्मक रुख’’ की आलोचना की और कहा कि एनडीएम (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन) नीति ने विदेशी सहायता स्वीकार करने पर कोई रोक नहीं लगायी है. उन्होंने यह भी कहा कि हम चाहते हैं कि राज्य की इसके लिए क्षतिपूर्ति की जाए. उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘हमने किसी विदेश सरकार से कोई अनुरोध नहीं किया था लेकिन यूएई सरकार ने स्वैच्छिक रूप से 700 करोड़ रुपये की पेशकश की. केंद्र सरकार ने कहा, नहीं, विदेशी सहायता स्वीकार करना हमारी गरिमा के अनुरूप नहीं है.’’

राज्य को (प्रारंभिक अनुमान के तहत) 20,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और उसने केंद्र से 2600 करोड़ रुपये की अंतरिम सहायता मांगी है. इसके अलावा उसने मनरेगा के तहत इसी राशि का एक विशेष पैकेज भी मांगा है.

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