नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीतिक का एक बड़ा स्तंभ माने जाने वाले मुथुवेल ने 7 अगस्त 2018 को दुनिया को अलविदा कह दिया. महज 14 साल की उम्र से ही राजनीति की दुनिया में प्रवेश करने वाले करुणानिधि के साथ ऐसा इतिहास जुड़ा हुआ है जिसे भुला पाना मुमकिन नहीं होगा. उनके साथ कई ऐसे किस्से भी जुड़े हुए हैं जो उन्हें सबसे अलग राजनेता की हैसियत दिलाता है. Also Read - AIADMK के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे पलानीस्वामी, OPS-EPS में बनी बात

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काला चश्मा बना पहचान Also Read - डीएमके सहित कई दलों ने की 'नीट परीक्षा 2020' को रद्द करने की मांग, पार्टी नेताओं ने संसद परिसर में दिया धरना

सबसे दिलचस्प किस्सा है उनकी पहचान बन चुका काला चश्मे का. काले चश्मे के साथ करुणानिधि का 46 साल तक चला. 94 साल की उम्र में उन्होंने इसके तभी बदला जब डॉक्टरों ने इसे हर हाल में उनसे बदलने को कहा. उन्होंने जर्मनी से इंपोर्टेड नए चश्मे को इसकी जगह दी. काला चश्मा एक तरह से उनकी पहचान बन चुका था. दरअसल, आंखों की दिक्कत के कारण ही उन्होंने काला चश्मा पहनना शुरू किया था.

करुणानिधि: वो शख्स जो स्क्रीनराइटर से बन गया सियासत का बाजीगर

करुणानिधि 2006 में तमिलनाडु के सबसे उम्रदराज सीएम बने थे. अपने 60 साल के सियासी सफर में उन्होंने एक भी चुनाव नहीं हारा था. वह 13 बार चुनाव जीतकर तमिलनाडु विधानसभा पहुंचे थे. कभी हार न मानने वाले जज्बे ने उन्हें अलग पहचान दी. उनकी अगुवाई में डीएमके ने नई ऊंचाइयों को छुआ. वह 5 बार तमिलनाडु के सीएम बने. सियासी सफर में उनका मुख्य मुकाबला दिवंगत जयललिता और उनकी पार्टी एआईएडीएमके से रहा.

कलैंनार नाम से थे लोकप्रिय

मुथुवेल करुणानिधि का जन्म 1924 में नागापट्टिनम जिले के थिरिक्कुवलाई में हुआ था. वह कलैंनार (कलाकार) के नाम से लोकप्रिय थे. वह 1969 से 2011 के बीच पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे. वह 10 बार द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) के अध्यक्ष रहे और द्रविड़ आंदोलन में उनकी प्रमुख भूमिका रही. उन्होंने द्रविड़ों के आत्मसम्मान की लड़ाई प्रभावी तरीके से लड़ी.

वह 14 साल की उम्र में ही सियासत की तरफ झुक गए थे और एक संगठन बनाकर सामाजिक कार्यों को अंजाम देने लगे थे. 1957 में 33 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव जीता था. 1967 में वह पहली बार मंत्री बने थे.