नई दिल्ली: पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव के मामले में बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय बुधवार को अपना फैसला सुनाया. इसमें भारत को बड़ी जीत मिली है. आईसीजे ने जाधव की फांसी की सजा पर रोक लगाते हुए पाकिस्तान से फैसले पर पुर्नविचार करने को कहा है. बता दें कि जाधव पहले भारतीय नागरिक नहीं हैं जिनको जासूस और आतंकवादी बताते हुए पाकिस्तान में मौत की सजा सुनाई गई है. उनसे पहले पंजाब के किसान सरबजीत को भी पाकिस्तान में आतंकवाद के झूठे आरोपों में फंसा दिया गया था. वह अनजाने में 30 अगस्त 1990 को सीमापार पाकिस्तानी इलाके में चले गए थे.

सरबजीत पर लाहौर और फैसलाबाद में बम विस्फोट करने का आरोप लगाया गया और इस आरोप में पाकिस्तान की स्थानीय अदालत ने उन्हें 1991 में मौत की सजा सुना दी. इसके बाद ऊंची अदालतों में उनकी सजा को बरकरार रखा गया. यहां तक कि पाकिस्तान की शीर्ष अदालत ने भी उनकी सजा बरकरार रखी. उनको अपना जुर्म कबूल करने के लिए यातनाएं दी गईं जबकि बम विस्फोट के संबंध में उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था. हालांकि क्षमा याचिका दाखिल किए जाने पर उनकी मौत की सजा बार-बार टलती रही. वहीं, भारत उनको मुक्त करने की बार-बार मांग करता रहा. भारत इस रुख पर कायम रहा कि वह कोई जासूस नहीं था.

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सरबजीत का पाकिस्तान में पकड़ा जाना और उनको मौत की सजा सुनाए जाने का मामला वैसा ही था जैसाकि जाधव का मौजूदा मामला है. पाकिस्तानी अधिकारियों ने जाधव को ईरान से अगवा करके उनके जासूस और आतंकवादी होने का आरोप लगाया है. हालांकि सरबजीत के मामले में भारत ने कभी अंतर्राष्ट्रीय अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया लेकिन जाधव के मामले में भारत ने मामले को अंतर्राष्ट्रीय अदालत में चुनौती दी है.

सरबजीत पर 26 अप्रैल 2013 को लाहौर की कोट लखपत जेल में कैदियों ने बर्बरता से हमला कर उनको जख्मी कर दिया गया था. हालांकि हमले के इस मामले में अधिकारियों पर संदेह जताया गया था. अस्पताल में उनसे मिलने के लिए गए उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि हमले में जेल के अधिकारी शामिल थे. भारत ने पाकिस्तान से उनको मानवता के आधार पर रिहा करने और भारत में उनका इलाज करने दिए जाने की अपील की, लेकिन पाकिस्तान ने भारत की अपील ठुकरा दी थी.

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पाकिस्तान सरकार ने दो मई 2013 को घोषणा की कि घायल होने के कारण सरबजीत की मौत हो गई. सरबजीत जब जीवित थे तब पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी ने उन्हें इंसाफ दिलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन सेना और कट्टरपंथी इस्लामी गुट के दबाव में पाकिस्तान सरकार ने उनकी आवाज को नजरंदाज कर दिया.