नई दिल्लीः फ्रांस के साथ 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर वहां के पूर्व राष्ट्रपति के सनसनीखेज खुलासे के बाद फ्रांस की मौजूदा सरकार ने सफाई दी है. फ्रांस की सरकार ने कहा है कि इस सौदे के लिए भारतीय कंपनी के रूप में अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को चुनने में उसकी कोई भूमिका नहीं थी. फ्रांस के यूरोप और विदेशी मामलों के मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि राफेल डील में भारत में ऑफसेट पार्टनर के चुनाव में फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं थी.

प्रवक्ता की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस बारे में 23 सितंबर 2016 को भारत और फ्रांस के बीच अंतर सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इसमें फ्रांसीसी सरकार की भूमिका केवल इतना भर थी कि वह इस विमान के उपकरणों की गुणवत्ता और इसकी आपूर्ति को सुनिश्चित करे. बयान में आगे कहा गया है कि फ्रांसीसी सरकार को भारत में इस सौदे के लिए किसे पार्टनर चुना जा रहा है उससे कुछ लेना देना नहीं था. भारत की हथियार खरीद नीति के मुताबिक फ्रांसीसी कंपनी को इसकी पूरी आजादी थी कि वह किसे अपने भारतीय साझेदार के रूप में चुनती है. इसके बाद उसे मंजूरी के लिए भारत सरकार के समक्ष रखना था.

दसॉल्ट एविएशन ने भी जारी किया बयान
इस बयान में कहा गया है कि भारत और फ्रांस की सरकार के बीच समझौते से पहले ही राफेल बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट एविएशन ने कई भारतीय कंपनियों के साथ भारतीय कानून के हिसाब से समझौता कर लिया था, जिसमें कई नीजि और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां शामिल थीं. दूसरी तरह दसॉल्ट एविएशन ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि उसने ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत रिलायंस डिफेंस को साझेदार बनाने का फैसला किया. कंपनी के बयान में कहा गया है कि इस साझेदारी के बाद दसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पस लिमिटेड नामक संयुक्त उपक्रम की स्थापना की गई. दोनों कंपनियों ने मिलकर नागपुर में एक प्लांट का निर्माण किया, जहां फाल्कन और राफेल के उपकरण बनाए जाएंगे.

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गौरतलब है कि शुक्रवार को पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा था कि अरबों डॉलर के इस सौदे में भारत सरकार ने अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को दसॉल्ट एविएशन का साझीदार बनाने का प्रस्ताव दिया था. इस नए खुलासे के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर जोरदार निशाना साधा. ओलांद की टिप्पणी इस मामले में भारत सरकार के रूख से इतर थी. इस खुलासे के तुरंत भारत सरकार ने बयान जारी कर एक बार फिर इस बात को जोर देकर कहा जा रहा है कि इस वाणिज्यिक फैसले में न तो सरकार और न ही फ्रांसीसी सरकार की कोई भूमिका थी.

विपक्षी दल हमलावर
फ्रेंच भाषा के एक प्रकाशन ‘मीडियापार्ट’ की खबर में ओलांद के हवाले से कहा गया है, ‘‘भारत सरकार ने इस सेवा समूह का प्रस्ताव दिया था और दसॉल्ट ने (अनिल) अंबानी समूह के साथ बातचीत की. हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, हमने वह वार्ताकार लिया जो हमें दिया गया.’’ यह पूछे जाने पर कि साझीदार के तौर पर किसने रिलायंस का चयन किया और क्यों, ओलांद ने कहा, ‘‘इस संदर्भ में हमारी कोई भूमिका नहीं थी.’’

विपक्षी दलों ने इस रिपोर्ट के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपने हमले और तेज कर दिए. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया, ‘‘प्रधानमंत्री ने बंद कमरे में राफेल सौदे को लेकर बातचीत की और इसे बदलवाया. फ्रांस्वा ओलांद का धन्यवाद कि अब हमें पता चला कि उन्होंने (मोदी) दिवालिया अनिल अंबानी को अरबों डॉलर का सौदा दिलवाया.’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘प्रधानमंत्री ने भारत के साथ विश्वासघात किया है. उन्होंने हमारे सैनिकों के लहू का अपमान किया है.’’

केजरीवाल ने बोला हमला
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ओलांद का बयान सीधे-सीधे उस बात का विरोधाभासी है जो अब तक मोदी सरकार कहती रही है और पूछा कि क्या करार पर ‘‘अहम तथ्यों को छिपाने’’ से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला गया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अप्रैल 2015 को पेरिस में तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल विमानों की खरीद का ऐलान किया था. करार पर अंतिम रूप से 23 सितंबर 2016 को मुहर लगी थी.

खबर में ओलांद ने करार का उनकी सहयोगी जूली गायेट की फिल्म से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया है. पिछले महीने एक अखबार में इस आशय की खबर है. रिपोर्ट में कहा गया था कि राफेल डील पर मुहर लगने से पहले अंबानी की रिलायंस एंटरटेनमेंट ने गायेट के साथ एक फिल्म निर्माण के लिये समझौता किया था.

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा, ‘‘अगर इस तरह को कोई करार हुआ है तो यह राफेल सौदा एक घोटाला है. मोदी सरकार ने झूठ बोला और भारतीयों को गुमराह किया. पूरा सच हर हाल में सामने आना चाहिए.’’ कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, ‘‘ सफ़ेद झूठ का पर्दाफ़ाश हुआ. प्रधानमंत्री के साठगांठ वाले पूंजीपति मित्रों को फायदा पहुंचाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को 30 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट कांट्रैक्ट से वंचित किया गया. इसमें मोदी सरकार की मिलीभगत और साजिश का खुलासा हो गया है.’’

(इनपुट- भाषा)