कर्नाटक के सीमावर्ती ज़िले बीदर में जुलाई महीने में बड़ी तादाद में लोगों की भीड़ जुटी. माना जा रहा है इस जनसभा में 75 हज़ार लोग शामिल थे. ये सभी लोग लिंगायत समाज के थे जो अपने समुदाय के लिए अलग धार्मिक पहचान की मांग लेकर आए थे. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी लिंगायतों की मांग का खुलकर समर्थन किया है. लिंगायत समाज कई सालों से अपने लिए अलग धर्म की मान्यता की मांग के साथ आंदोलनरत है. इनके आंदोलन का केंद्र तो कर्नाटक है लेकिन पड़ोसी राज्यों जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की अच्छी ख़ासी आबादी है.

क्यों चाहिए अलग धर्म?

कर्नाटक की कुल आबादी का 18 फीसदी हिस्सा लिंगायत समाज का है. इनका मानना है कि लिंगायत संप्रदाय भी अलग धर्म है क्योंकि इनकी अपनी परंपराएं और पूरा पद्धति है, जो हर धर्म की होती है. ऐसे में वो किसी दूसरे धर्म का हिस्सा कैसे हो सकते हैं?

लिंगायत संप्रदाय की स्थापना 12वीं सदी के समाज सुधारक बासवन्ना ने की थी. इस संप्रदाय के लोग वेदों में यकीन नहीं रखते और न ही मूर्ति पूजा करते हैं. ये अपने शरीर पर इष्टलिंग धारण करते हैं, जो कि एक गेंदनुमा आकृति होती है. इसे वो धाहे से शरीर से बांधते हैं. इनका मानना है कि इष्टलिंग आंतरिक चेतना का प्रतीक है.

लिंगायत पर राजनीति

यहां ध्यान देने वाली बात है कि 8 मगीनों में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. लिंगायत समाज जरूरी वोटबैंक है. चुनाव भी इनकी भूमिका खास रहेगी. उधर, कर्नाटक में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदयुरप्पा भी इसी संप्रदाय से आते हैं. लेकिन बीजेपी हिंदू धर्म से अलग लिंगायत धर्म के अस्तित्व को नहीं मानती. वहीं, कांग्रेस लिंगायत का समर्थन पाने के लिए उनकी हिमायती बन गई है.

सिद्धारमैया सरकार के पांच मंत्री इस मसले पर लिंगायतों का पुरोहित वर्ग की सलाह लेंगे. जिसके बाद मुख्यमंत्री को एक रिपोर्ट पेश की जाएगी. मुमकिन है जल्द ही लिंगायतों को अलग धर्म की मान्यता देने के लिए राज्य सरकार केंद्र सरकार को लिखेगी.