चेन्नई. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 का सफल प्रक्षेपण किया है. जीएसएलवी एमके थ्री-डी 1 रॉकेट को शाम 5 बजकर 28 मिनट पर चेन्नई से तकरीबन 120 किलोमीटर दूर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से प्रक्षेपित किया गया. जीएसएलवी (GSLV) मार्क-3 ने अपने साथ संचार उपग्रह जीसैट-19 को लेकर उड़ान भरी. जीएसएलवी एमके थ्री भारत का सबसे भारी रॉकेट है.

जीएसएलवी एमके 3 को कक्षा में स्थापित कर दिया गया है. इसरो के चेयरमैन किरण कुमार ने इस कामयाब परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों को बधाई दी है.

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इस रॉकेट का निक नेम ‘फैट बॉय’ है. जीएसएलवी मार्क-3 अपने साथ 3,136 किलोग्राम वजनी संचार उपग्रह लेकर गया है, जिसे उसने कक्षा में स्थापित किया. जीएसएलवी सीरीज के इस सबसे वजनी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 ने सोमवार को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से अपराह्न 5.28 बजे पहली बार उड़ान भरी. 43.43 मीटर लंबा और 640 टन वजनी इस रॉकेट ने 16 मिनट में अपनी यात्रा पूरी की और पृथ्वी की सतह से 179 किलोमीटर की ऊंचाई पर जीसैट-19 को उसकी कक्षा में स्थापित किया.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, जीसैट-19 एक मल्टी-बीम उपग्रह है, जिसमें का एवं कू बैंड संचार ट्रांसपोंडर लगे हैं. इसके अलावा इसमें भूस्थैतिक विकिरण स्पेक्ट्रोमीटर (जीआरएएसपी) लगा है, जो आवेशित कणों की प्रकृति का अध्ययन एवं निगरानी करेगी और अंतरिक्ष विकिरण के उपग्रहों और उसमें लगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी करेगा.

इस उपग्रह की कार्य अवधि 10 वर्ष है. इसमें अत्याधुनिक अंतरिक्षयान प्रौद्योगिकी का भी इस्तेमाल किया गया है और यह स्वदेश निर्मित लीथियम ऑयन बैट्री से संचालित होगा. वहीं, जीएसएलवी मार्क-3 त्रिस्तरीय इंजन वाला रॉकेट है. पहले स्तर का इंजन ठोस ईंधन पर काम करता है, जबकि इसमें लगे दो मोटर तरल ईंधन से चलते हैं. रॉकेट का दूसरे स्तर का इंजन तरल ईंधन से संचालित होता है, जबकि तीसरे स्तर पर लगा इंजन क्रायोजेनिक इंजन है.

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक के. सिवन ने कहा, ‘रॉकेट की भारवहन क्षमता चार टन तक है। इस रॉकेट की भविष्य की उड़ानों में भारवहन क्षमता को और बढ़ाया जाएगा’ इसरो 2014 में क्रायोजेनिक इंजन से रहित इसी तरह का रॉकेट प्रक्षेपित कर चुका है, जिसका उद्देश्य रॉकेट की संरचनागत स्थिरता और उड़ान के दौरान गतिकी का अध्ययन करना था. इसरो के अधिकारियों ने बताया कि रॉकेट के व्यास में विभिन्न स्तरों पर वृद्धि की गई है, जिसके चलते इसकी ऊंचाई कम की जा सकी, जबकि इसका भार काफी अधिक है.

इसरो के एक अधिकारी ने कहा, ‘नया रॉकेट थोड़ा छोटा है, लेकिन इसकी क्षमता कहीं अधिक है।’

(IANS से प्राप्त जानकारी के साथ)