मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वोटिंग हो जाने के बाद सबकी नजर राजस्थान चुनाव पर टिकी है. राजस्थान का चुनाव दिलचस्प मोड़ में पहुंच गया हैं. एक तरफ बीजेपी लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने की कोशिश में लगी है तो दूसरी तरफ कांग्रेस सत्ता में वापसी का प्रयास कर रही है. ऐसे में सबकी निगाहें अलग-अलग वर्ग पर टिकी हैं. राजस्थान में अनुसूचित जाति वर्ग और राजपूत वोट अच्छी खासी तादाद में हैं. ऐसे में दोनों ही प्रमुख पार्टियां इस पर नजरें जमाई हुई हैं. वहीं, बीएसपी ने भी 197 सीट पर उम्मीदवार उतार अनुसूचित जाति के वोटर्स को लुभाने की कोशिश की है. Also Read - जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल होने तक मैं विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ूंगा: उमर अब्दुल्ला

क्या है अनुसूचित जनजाति का समीकरण
पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित 34 सीटों में से 32 सीट पर जीत दर्ज की थी. लेकिन दलित संगठनों ने इस साल मार्च-अप्रैल में पूरे देश में बड़ा आंदोलन किया था. इसका बड़ा असर राजस्थान में पड़ा था. 2 अप्रैल को राज्सथान में हुई बंदी बताती है कि उनमें सरकार को लेकर कितनी नाराजगी थी. बीजेपी को यकीन है कि वे उन्हीं को वोट देंगे तो कांग्रेस का मानना है कि एक तो राज्य सरकार के खिलाफ इस जाति का नाराजगी है तो दूसरी तरफ वह उन्हें अपना हिमायती मानने लगी है. Also Read - राजग बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व मे ही लेड़ेगी : नित्यानंद

नाराजगी दिखाई
कहा जा रहा है कि यह समुदाय बीजेपी के साथ था, लेकिन हाल की कुछ हिंसक घटनाओं के बाद उसने बीजेपी के खिलाफ नाराजगी दिखाई है. वह कांग्रस को कितना पसंद करती है इस पर तो सवाल उठ रहा है, लेकिन ये भी कहा जा रहा है कि वह बीजेपी के साथ जाती नहीं दिख रही है. हालांकि, दलित नाम से कई नए संगठन खड़े हो गए हैं और चुनाव में उतर गए हैं. इसका असर किधर पड़ेगा, इसपर संशय बना हुआ है. अम्बेडकराइट पार्टी ऑफ इंडिया ने 30 से ज़्यादा उम्मीदवार उतारे हैं. Also Read - अमित शाह आज पश्चिम बंगाल के लिए करेंगे डिजिटल रैली, क्‍या ममता पर साधेंगे निशाना?

बीएसपी का जनाधार घटा
बीएसपी की बात करें तो साल 2008 के चुनाव में उसे 7 फीसदी वोट मिले थे और 6 सीट जीतने में कामयाब हुई थी. हालांकि, बाद में सभी कांग्रेस में शामिल हो गए थे. इसके बाद साल 2013 में बीजेपी को सिर्फ 3.37 फीसदी वोट मिले और वह सिर्फ 3 सीट जीत पाई.

राजपूत किधर जाएंगे?
राजस्थान में माना जाता है कि राजपूत समाज बीजेपी का परंपरागत वोटर है. लेकिन इस बार ऐसा दिख नहीं रहा है. लेकिन, वह कांग्रेस की तरफ भी झुके नहीं दिख रहे हैं. हालांकि, बीजेपी का दावा है की यह समाज उसकी तरफ ही रहेगा.
बीजेपी ने इसे देखते हुए ही राजपूत समाज के 26 लोगों को टिकट दिया है. दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी 12 लोगों को टिकट दिया है, लेकिन उन्हें कांग्रेस से और टिकट की उम्मीद थी.

क्या जसवंत सिंह-भैरो सिंह शेखावत का पड़ेगा असर
बताया जा रहा है कि राज्य में जसवंत सिंह राजपूत समाज के बड़े कद्दावर नेता के तौर पर देखे जाते रहे हैं. लेकिन साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट बीजेपी ने काट दिया था. इससे समाज बीजेपी से नाराज हो गया. वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि भैरो सिंह शेखावत के परिवार के सदस्य टिकट मांग रहे थे, जिसकी उपेक्षा की गई. इसमें एक बड़ी बात ये है कि पुलिस ने उस राजपूत सभा भवन में छापा मारा, जिसे समाज के लोग मंदिर की तरह पूजते हैं. इसका असर चुनाव में देखने को मिलेगा.

टिकट देकर मैनेज कर लिया?
हालांकि, अन्य लोगों का कहना है कि सारी नाराजगी को बीजेपी ने टिकटों से मैनेज कर लिया है. 26 टिकट कम नहीं होते हैं. हालांकि, अजमेर लोकसभा उपचुनाव में राजपूतों ने बीजेपी का साथ नहीं दिया था. लेकिन बीजेपी को उम्मीद है कि समाज एक बार फिर उनपर भरोसा जताएगा.