नई दिल्ली: एफएमसीजी कंपनी नेस्ले इंडिया के वकीलों ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात स्वीकार कर ली है कि उनके लोकप्रिय प्रोडक्ट मैगी में सीसा यानी Lead का इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी से कहा कि बच्चे सीसा के साथ मैगी क्यों खाएं.

इसके बाद नेस्ले बनाम भारत सरकार की लड़ाई तेज हो गई है. दरअसल, नेशनल कंज्यूमर फोरम ने मैगी में सीसा होने की मात्रा को लेकर नेस्ले के खिलाफ केस दर्ज कराया था. आपको याद दिला दें कि साल 2015 में स्वास्थ्य सुरक्षा के मानकों को पूरा ना करने के कारण मैगी पर बैन लगा दिया गया था और उसके 550 टन उत्पाद को नष्ट कर दिया गया था. इसके साथ ही नेशनल कंज्यूमर फोरम ने तीन साल तक गलत तथ्य पेश करने के आरोप में नेस्ले पर 640 करोड़ का जुर्माना लगाया था.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज ने जब नेस्ले के वकीलों से पूछा कि सीसा युक्त नूडल क्यों खाएं? तो इस पर नेस्ले के वकील ने कहा कि मैगी में सीसा की मात्रा बहुत ही कम है. यह परमीसिबल लिमिट या जायज स्तर तक ही है.

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई पर एफएमसीजी कंपनी नेस्ले ने कहा कि हम माननीय न्यायालय का ध्यान इस ओर खींचना चाहते हैं कि आई रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट है कि कुछ नमूनों में सीसा की मात्रा पता लगाने योग्य सीमा से भी नीचे है. नेस्ले ने कहा कि न्यायालय ने पूछा है कि हमें लीड के साथ नूूूूडल क्यों खाना चाहिए. दरअसल, लेेड यानी सीसा हर जगह मौजूद है. 2.5 पीपीएम की सीमा को अनुमेय सीमा के रूप में तय किया गया है.

क्या कहते हैं डाॅक्टर: 

डॉक्टरों का मानना है कि सीसा/लेड युक्त भोजन खाने से पेट में दर्द हो सकता है. स्किन की समस्याएं हो सकती हैं और गर्दन व सिर में दर्द या जलन हो सकती है. इसके अलावा यह खून के प्रभाव में रुकावट पैदा कर सकती है. किडनी फेल हो सकती है. बच्चों के विकास में रुकावट आ सकती है. गाइनेकोलोजिस्ट रेनू चावला के अनुसार गर्भवती महिलाओं को मैगी नूडल खाने की अनुमति नहीं दी जाती. क्योंकि इससे भ्रुण का विकास रुक सकता है या गर्भपात होने की आशंका भी हो सकती है.

जानिये क्या है मामला :

यह मामला साल 2015 का है जब यूपी फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मैगी के सैंपल की जांच में सीसा का स्तर 17.2 पीपीएम पाया था. तय मात्रा 2.5 से यह स्तर काफी ज्यादा है. इसके बाद मैगी की बिक्री पर रोक लगा दी गई.