नई दिल्ली: ‘हम शाम सात बजे निकले थे. लगातार चल रहे थे. चलते-चलते रात हो गई, कई किलोमीटर चलने के बाद काफी थक गए. इतना थक गए कि बैठ के सुस्ताने लगे. इतना थके थे कि कुछ देरी में ही सो गए. मैं कुछ दूरी पर था. ट्रेन के आने की आहट मैंने सुन ली, मैं चिल्लाया कि सब हटो जल्दी से.. लेकिन बाकी लोग थकने के बाद इतनी गहरी नींद में थे कि कोई आवाज़ तक न सुन सका. और ट्रेन के गुजरने पर ख़त्म हो गए.’ Also Read - अनुष्‍का शर्मा की सनशाइन वाली पिक्‍चर पर फ्लैट हुए विराट कोहली, इंस्‍टाग्राम पर इस अंदाज में दिया जवाब

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेलवे ट्रैक पर जान गंवाने वाले मजदूर ट्रेन की चपेट में कैसे आए, ये बताते-बताते धीरेंद्र की आँखें नम हो जाती हैं. धीरेंद्र उन दो तीन लोगों में से एक है, जो अपने साथियों के साथ था और ट्रेन की चपेट में आने से बच गया. Also Read - महाराष्ट्र: छात्रावास अधीक्षक ने छात्रा से किया रेप, प्रेग्‍नेंट होने पर मां ने नर्स से कराया गर्भपात

धीरेंद्र बताता है कि ‘हम सभी लोग महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश अपने गांव जा रहे थे. हम गुरुवार को शाम सात बजे चले. और सुबह चार बजे तक लगातार चलते रहे. नौ घंटे तक लगातार चलने की वजह से सभी लोग बुरी तरह से थक गए थे. धीरेंद्र बताता है कि इतना चलने के बाद हम आराम के बारे में सोचने लगे. और फिर अधिकतर लोग थकन में ट्रैक पर ही बैठ गए. आराम करने की नियत से बैठे थे, लेकिन जैसे ही बैठे लोगों को नींद आने लगी. और अधिकतर लोग सो भी गए. Also Read - Coronavirus: देश में कोविड-19 के कुल मामले हुए 2 लाख 28 हजार, इन राज्यों में एक महीने में दस गुना से अधिक नए मामले

धीरेंद्र के अनुसार मैं कुछ दूरी पर था. मुझे ट्रेन आने की भनक लग गई. मैंने दूर से ही चिल्लाना शुरू कर दिया, लेकिन लोगों को थकान इतनी थी कि वह गहरी नींद में थे और उन्हें मेरी आवाज़ नहीं सुनाई दी. और सोते-सोते ट्रेन की चपेट में आ गए.

धीरेंद्र ने ये भी बताया कि हमने करीब एक हफ्ते पहले घर जाने को पास के लिए आवेदन किया था, लेकिन हमें पास नहीं मिला. हम कई दिन पहले ही बेरोजगार हो गए थे. और रुपए भी किसी के पास नहीं थे. पास नहीं मिलने के बाद भी हमने तंग आकर गांव जाने का फैसला लिया. और सड़क की बजाय रेलवे ट्रैक से चलने के फैसला किया. सबने कहा कि ट्रेन नहीं चल रही हैं, इसलिए ट्रैक पर चल पड़े.

धीरेंद्र बताता है कि वह वह और बाकी साथी 100 से अधिक रोटियां निकले थे. औरंगाबाद से मध्य प्रदेश पैदल पहुँचने में काफी दिन लगते इसलिए रोटियां रास्ते में खाने के लिए थीं, लेकिन सब बर्बाद हो गया.