तिरुवनंतपुरम: कहने को तो बात महज चार रुपए की थी, लेकिन जब यह सिद्धांतों के खिलाफ हो तो महात्मा गांधी उसे बिलकुल सहन नहीं कर पाते थे. ऐसी ही एक भूल के लिए नाराज महात्मा गांधी ने कस्तूरबा गांधी के खिलाफ पूरा एक आलेख ही लिख दिया था और इस लेख में उन्होंने इस कृत्य को ‘चोरी’ तक बता दिया.

‘नवजीवन’ में 1929 में लिखा था लेख
दुनिया भर में मंगलवार को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई जाएगी. ऐसे में साप्ताहिक अखबार ‘नवजीवन’ में 1929 में उनका लिखा एक आलेख सामने आया है. इस लेख से पता चलता है कि वह सत्य और नैतिकता से कोई भी समझौता नहीं करने के पक्ष में थे.

‘मेरी व्यथा, मेरी शर्मिंदगी’ में  पत्नी की आलोचना 
‘नवजीवन’ एक साप्ताहिक अखबार था, जिसका प्रकाशन गांधी जी करते थे. ‘मेरी व्यथा, मेरी शर्मिंदगी’ शीर्षक से प्रकाशित लेख में गांधी जी ने गुजरात में अहमदाबाद के अपने आश्रम में अपनी पत्नी कस्तूरबा समेत कुछ अन्य आश्रमवासियों की कमियों की आलोचना की है. उन्होंने यह सफाई भी दी है कि उन्होंने इस लेख को लिखने का फैसला क्यों किया. गांधी जी ने लेख में इस बात का जिक्र किया, ”आखिरकार मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अगर मैं ऐसा नहीं करता तो यह कर्तव्य का उल्लंघन होता है.”

कस्तूरबा की कमजोरियां 
राष्ट्रपिता ने कहा कि उन्हें अपनी आत्मकथा में कस्तूरबा के कई गुणों का वर्णन करने में कोई हिचकिचात नहीं हुई, लेकिन ”उनकी कुछ कमजोरियां भी हैं जो इन सदगुणों पर अघात करती हैं”. गांधी जी ने लिखा है कि एक पत्नी का कर्तव्य मानते हुए, उन्होंने अपना सारा धन दे दिया, लेकिन ”समझ से परे यह संसारी इच्छा अब भी उनमें है.”

गांधी ने कहा, ”एक या दो साल पहले उन्होंने (कस्तूरबा ने) 100 या 200 रुपए रखे थे, जो विभिन्न मौकों पर अगल-अलग लोगों से भेंट के तौर पर मिले थे.”

पत्नी की ‘चूक’ पकड़ में आई
गांधीजी ने लिखा, ” आश्रम का नियम है कि वह अपना मानकर कुछ नहीं रख सकती हैं. भले ही यह उन्हें दिया गया हो. इसलिए यह रुपए रखना अवैध है.” उन्होंने कहा कि आश्रम में कुछ चोरों के घुस जाने की वजह से उनकी पत्नी की ‘चूक’ पकड़ में आई.

कमरे में चोर घुस आए
गांधी जी ने लिखा, ” उनके लिए और मंदिर (आश्रम) के लिए दुर्भाग्य था कि एक बार उनके कमरे में चोर घुस आए. उन्हें कुछ नहीं मिला, लेकिन उनकी (कस्तूरबा) की चूक पकड़ में आ गई.”

धन रखने का मोह खत्म नहीं
गांधी ने कहा कि कस्तूरबा ने गंभीरता से पश्चाताप किया, लेकिन यह लंबे वक्त नहीं चला और असल में ह्रदय परिवर्तन नहीं हुआ और धन रखने का मोह खत्म नहीं हुआ.

लेख में ‘चोरी’ बताया 
गांधी जी ने लिखा, ” कुछ दिन पहले, कुछ अजनबियों ने चार रुपए भेंट किए. नियमों के मुताबिक, यह रुपए दफ्तर में देने के बजाय उन्होंने अपने पास रख लिए.” इस बात को अपने लेख में ‘चोरी’ बताते हुए गांधी जी लिखते हैं कि आश्रम के एक निवासी ने उनकी गलती की ओर इशारा किया. उन्होंने रुपए को लौटा दिया और संकल्प लिया कि ऐसी चीजें फिर नहीं होंगी.”

भविष्य में पकड़ी तो गांधी को छोड़ना होता 
राष्ट्रपिता लिखते हैं, ” मेरा मानना है कि वह एक ईमानदार पश्चाताप था. उन्होंने संकल्प लिया कि पहले की गई कोई चूक या भविष्य में इस तरह की चीज करते हुए वह पकड़ी जाती हैं, तो वह मुझे और मंदिर को छोड़ देंगी.”