नई दिल्ली. पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में से त्रिपुरा और नगालैंड विधानसभा चुनावों के परिणाम भारतीय जनता पार्टी के लिए इस साल की सबसे बड़ी उपलब्धि है. असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के बाद त्रिपुरा की यह ऐतिहासिक जीत, भाजपा के लिए देशभर में ‘टॉनिक’ का काम करेगी. देश के ये राज्य अब तक भाजपा की पकड़ से बाहर रहे हैं. लेकिन पिछले तीन सालों में ही एक-एक कर असम, मणिपुर, अरुणाचल के बाद अब त्रिपुरा में पार्टी को सत्ता में लाने के पीछे असम के नेता डॉ. हेमंत बिस्व सरमा का बहुत बड़ा रोल रहा है. यह हेमंत की ही सोच थीं जिसके दम पर त्रिपुरा में भाजपा ने 25 सालों से सत्ता पर काबिज माकपा के माणिक सरकार के शासन को उखाड़ फेंका. वे त्रिपुरा के लिए पार्टी के चुनाव प्रभारी भी हैं. हालांकि हेमंत इसे इंडिजीनियस पीपुल फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ गठबंधन से जोड़कर देखते हैं. उन्होंने कहा भी कि आईपीएफटी के साथ गठजोड़ करना दोधारी तलवार पर चलने जैसा था. इससे हमें पराजय भी मिल सकती थी या हम बड़ी जीत की तरफ भी आगे बढ़ सकते थे. लेकिन हमारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भरोसा था कि यह हमें बेहतर परिणाम देगा. Also Read - Essay on Lenin by Ganesh Shankar Vidyarthi | लेनिन की मौत के बाद गणेशशंकर विद्यार्थी ने जो लिखा, उसे पढ़ना जरूरी है

कांग्रेस से ही सीखा राजनीति का ककहरा
डॉ. हेमंत बिस्व सरमा पहले कांग्रेस में ही थे. कांग्रेस में रहते हुए ही उन्होंने राजनीतिक जोड़-तोड़ और जुगाड़ की ट्रेनिंग ली. अब वे पूर्वोत्तर में कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहे हैं. एक तरह से वे पीएम मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान की तरह पूर्वोत्तर को कांग्रेस से मुक्त करने के अभियान पर हैं. उनकी सक्रियता और कर्मठता को असम के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हितेश्‍वर सैकिया ने परख लिया था. सैकिया उन्हें पार्टी में लेकर आए और असम आंदोलन के शीर्ष नेता भृगु फूकन के खिलाफ 1996 में जालुकबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया. 1996 में पहली बार वे चुनाव हार गए, लेकिन 2001 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने फूकन को हरा दिया. इसके बाद से डॉ. हेमंत का राजनीतिक ग्राफ लगातार चढ़ता ही गया. तरुण गोगोई की सरकार में उन्हें बड़ा पद दिया गया. गोगोई ने 2006 में दूसरी बार सीएम बनने के बाद हेमंत को कैबिनेट मंत्री बनाया. इसी दौरान हेमंत ने नई राजनीतिक ऊंचाइयां छूई. 2011 में तरुण गोगोई तीसरी बार सरकार में लौटे तो हेमंत की ताकत और बढ़ी. वे गोगोई के बाद पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण नेता हो गए. लेकिन यहां भी कांग्रेस पार्टी का परिवारवाद ही हेमंत के आड़े आ गया. बेटे के मोह में कभी तरुण गोगोई की ‘आंखों के तारे’ रहे हेमंत, उनकी ‘आंख की किरकिरी’ बन गए. 2015 में ही हेमंत ने दूसरी राहें तलाशनी शुरू की और भाजपा में पहुंच गए. Also Read - tripura bjp workers demolished vladimir lenins statue by bulldoz | त्रिपुरा: कमल खिलते ही राज्य में भड़की हिंसा, ढहा दी गई व्लादिमीर लेनिन की मूर्ति

अच्छे रणनीतिकार और प्रखर वक्ता रहे हैं हेमंत
हेमंत बिस्व सरमा गुवाहाटी के प्रसिद्ध कॉटन कॉलेज के छात्र रहे हैं. वहां के पुराने छात्र और उनके मित्र गुवाहाटी विश्वविद्यालय के शिक्षक ननीगोपाल महंत कहते हैं, ‘हेमंत स्कूल-कॉलेज के जमाने से ही अच्छे वक्ता रहे हैं. वे एक अच्छे संगठक और रणनीतिकार हैं. योजना बनाने के बाद उसे जमीन पर उतारने की रणनीति उनसे सीखनी चाहिए. अपने कॉलेज के छात्र नेता के रूप में वे काफी लोकप्रिय रहे हैं. लिखने-पढ़ने में भी उनकी गहरी रुचि है. अभी भी वे जब मौका मिलता है, लिखते हैं. महंत ने बताया कि राजनीति में रहते हुए हेमंत ने गुवाहाटी विश्‍वविद्यालय से पीएचडी की. उन्होंने राजनीतिक अनुभव पर आधारित असमिया पुस्तक ‘अनन्य दृष्टिकोण’ भी लिखी है, जिसके कई संस्करण बिक चुके हैं. 46 वर्षीय डॉ. सरमा ने एमए और लॉ करने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट में कुछ वर्षों तक प्रैक्टिस भी की. उनका यह अनुभव आज उनकी राजनीति में काम आ रहा है.