नई दिल्ली: विधानसभा चुनाव से 14 महीने पहले आरक्षण की मांग को लेकर महाराष्ट्र एक बार फिर सुलग उठा है. मराठा एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं. वह सरकारी नौकरियों और सरकारी कॉलेजों में 16 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे हैं. सोमवार को एक युवक ने आरक्षण की मांग को लेकर नदी में कूद कर जान दे दी. इसके बाद मराठा सड़कों पर उतर आए. महाराष्ट्र में मराठा जाति का दबदबा है. राज्य में उनकी आबादी 32 प्रतिशत है लेकिन 75 प्रतिशत जमीन पर उनका मालिकाना हक है. इतना ही नहीं राज्य की ज्यादातर चीनी मिलें और शिक्षण संस्थान मराठों के पास हैं. राज्य के 18 में से 12 मुख्यमंत्री इसी जाति से हुए हैं.

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सरकार की तीन रिपोर्ट कहती है कि मराठा न तो शिक्षा के स्तर पर और न ही सामाजिक स्तर पर पिछड़े हैं. मंडल कमिशन रिपोर्ट 1990, नेशनल कमिशन फॉर बैकवर्ड क्लास रिपोर्ट 200 और राज्य सरकार की बैकवर्ड क्लास कमिशन रिपोर्ट 2008 की इन रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है. मराठा आरक्षण की मांग आर्थिक आधार पर है. मराठों का कहना है कि आत्महत्या करने वाले किसानों में सबसे ज्यादा संख्या मराठों की है. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है.

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आरक्षण देने में दिक्कत क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार कोई भी राज्य 50 प्रतिशत की सीमारेखा से बाहर जाकर आरक्षण नहीं दे सकता. मराठा 16 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहे हैं. ओबीसी के 27 प्रतिशत के कोटे में ही अगर सरकार मराठों को आरक्षण देती है तो ओबीसी आंदोलन शुरू हो सकता है. यही कारण है कि सरकार ने आरक्षण देने की बजाय पढ़ाई की फीस आधी करने, एजुकेशन लोन पर ब्याज दरें आधी करने और हॉस्टल सुविधाएं बढ़ाने का आश्वासन दिया है लेकिन यह मराठों को मंजूर नहीं है.

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कोर्ट ने पलट दिया था फैसला
जून 2014 में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार ने मराठों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 16 प्रतिशत आरक्षण दिया था. इसके साथ ही सरकार ने मुस्लिमों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था. इसके बाद राज्य में आरक्षण का दायरा बढ़कर 52 प्रतिशत हो गया था. सरकार के इस फैसले के पांच महीने बाद हाईकोर्ट ने इसपर रोक लगा दी.

राजनीतिक मायने
महाराष्ट्र में 18 में से 12 मुख्यमंत्री मराठा जाति से हुए हैं. राज्य की सियासत में मराठा एक बड़ी ताकत हैं. विधानसभा की 288 सीटों में से 80 पर मराठा वोटों को निर्णायक माना जाता है. परंपरागत रूप से मराठा कांग्रेस,एनसीपी और शिवसेना के वोटर रहे हैं. बीजेपी को पता है कि माराठा उसे वोट नहीं देते. चार साल से देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री हैं.मनोहर जोशी के बाद सीएम पद संभालने वाले फडणवीस राज्य के दूसरे ब्राह्मण नेता हैं. मराठों की आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी सारी बातें मानकर अपने अन्य वोटर्स को नाराज नहीं करना चाहती.