#MeToo (‘मी टू’) अभियान भारत में दिनोदिन जोर पकड़ता जा रहा है. यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाएं मुखर होकर मीडिया के सामने आपबीती सुना रही हैं और सुनने वाले सफेदपोशों के चेहरे से नकाब उतरता देख रहे हैं और हर नए खुलासे पर चौंक रहे हैं. दुनिया ने देखा कि इस अभियान की ताकत भांपकर दुनिया की सैर कर लौटे हमारे विदेश राज्यमंत्री एम.जे. अकबर को पद से इस्तीफा देना पड़ा है.

आलम यह है कि अभिनेत्री और महिला अधिकारों की पैरोकार नंदिता दास के पिता प्रख्यात चित्रकार जतिन दास पर भी निशा बोरा नाम की एक महिला ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. फिल्म, मीडिया व दूसरे क्षेत्रों की महिलाओं ने भी अपनी आवाज बुलंद की है. यौन उत्पीड़न का आरोप नाना पाटेकर, आलोकनाथ, सुशांत सिंह राजपूत, निर्देशक साजिद खान और संगीतकार अनु मलिक सहित अन्य कई जाने-पहचाने बड़े लोग झेल रहे हैं.

मी टू के इस दर्दबयानी के बीच सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट और लीगल एक्टिविस्ट कमलेश जैन से इस अभियान पर अपने विचार रखे हैं. उन्होंने कहा, “मैं मी टू को एक बहुत अच्छी पहल मानती हूं, क्योंकि ज्यादातर महिलाएं यौन हिंसा, उत्पीड़न की शिकार होती हैं. घर में, बाहर सड़कों पर, कार्यस्थलों पर ट्रेन में, बस में हर जगह. अभी तक हम महिलाएं इसको दबाती आई थीं. पुरुष गलत होते हुए भी बच जाता था और पीड़ित होते हुए भी महिला ‘गलत’ और ‘गंदी’ मानी जाती थी और जीवनभर के लिए अपनी ही नजरों में गिर जाती थी. वह समाज के डर से इसे छिपाए रखती थी. यह बहुत ही अच्छा और सही अभियान है.”

यह अभियान अमेरिका में 2017 में शुरू हुआ और उसके बाद अब इसने हिंदुस्तान में भी जोर पकड़ लिया है. इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक गजट के कारण पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन गई है और यही वजह है कि इस अभियान को बल मिला है. यह बात छेड़ने पर कि ‘मी टू’ को भारत आने में एक साल लग गया, कमलेश जैन कहती हैं, “भारत में आने में एक साल लगा है तो इसे अभी बहुत जल्दी ही कहेंगे, वरना यहां आते-आते इसे 50 साल लग जाते. उसका जल्दी आना मीडिया की वजह से संभव हुआ है. समाज तो इन चीजों को पकड़ता ही नहीं है. सोया हुआ समाज है हमारा. थोड़ी बहुत ज्यूडिशियरी जगी है.”

उन्होंने कहा, “ज्यूडिशियरी यानी न्यायपालिका ने महिलाओं को बहुत से अधिकार दिए हैं, तब जाके उनमें हिम्मत आई है मी टू जैसा अभियान छेड़ने का. जस्टिस सुजाता मनोहर और दो अन्य जजों की विशाखा गाइडलाइंस. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को लेकर 1997 में दिशानिर्देश देने में उनकी प्रमुख भूमिका रही. 1997 में जब गाइडलाइंस आ गईं तो उसके बाद 2013 में हमारा एक्ट बना. सुस्ती देखिए कि एक्ट बनने में करीब 16 साल लग गए. हां, इसे ज्यूडिशियरी से संसद पहुंचने में 16 साल लग गए. उस हिसाब से तो मी टू जल्दी आया है. सोचिए कितनी सुस्ती है हमारे समाज में.”

यह पूछे जाने पर कि क्या यौन उत्पीड़न को साबित करने के लिए सबूत जरूरी हैं? कमलेश जैन कहती हैं, “देखिए, यौन उत्पीड़न के मामले में अब सिर्फ पीड़ित का बयान जरूरी है, उसका स्टेटमेंट (बयान) ही काफी है. किसी यंग लड़की का रेप हुआ तो उसमें इविडेंस क्या होगा. पहले पीड़िता को साबित करना होता था, अब अपराधी को डिफेंड करना होता है. ज्यूडिशियरी ने कहा है कि स्टेटमेंट पर मामला दर्ज हो सकता है. सजा हो सकती है. यौन उत्पीड़न के मामले में अब सबूत जरूरी नहीं है. अपराधी खुद को डिफेंड करे. पीड़िता को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है.

(इनपुट आईएएनएस)