नई दिल्ली: मिजोरम की राजनीति पर पकड़ रखने वालों को 2018 में मिजो नेशनल फ्रंट यानी एमएनएफ की जीत पर हैरान नहीं होगी. 1987 में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था. 1989 से राज्य में परंपरा रही है कि हर 10 साल पर यहां सरकार बदल जाती है. सत्ता का ट्रांसफर दो पार्टियों कांग्रेस और एमएनएफ में होता आया है. अगर इस बार कांग्रेस सरकार बना लेती तो यह इतिहास होता और लल थनहवला लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनते. कांग्रेस के दिग्गज नेता और मिजोरम में पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके लल थनहवला हालांकि इस बार चुनाव मैदान में नहीं उतरना चाहते थे, लेकिन चुनाव लड़ने की स्थिति में उन्होंने विधानसभा में फिर प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए दो सीटों से पर्चा भरा, दोनों ही सीटों पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

जानिए उस शख्स के बारे में, जिसने मिजोरम बीजेपी का खोला खाता

नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में मिजोरम कांग्रेस का आखिरी गढ़ था जो इस चुनाव में ढह गया. पूर्वोत्तर के राज्यो में साल 2016 से कांग्रेस के हाथों से सत्ता खिसकने लगी थी. 2018 बीतते-बीतते कांग्रेस पूर्वोत्तर से पुरी तरह साफ हो गई. एक समय ऐसा भी था जब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद इन राज्यों में भी बदलाव की हवा बह रही है. पूर्वोत्तर राज्यों में असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा में बीजेपी की सरकार है. वहीं अन्य राज्यों में स्थानीय दलों के नेतृत्व में सरकारें हैं.

दो साल में एक के बाद एक कांग्रेस के हाथ से निकल गए पूर्वोतर के सारे राज्य

मिजोरम विधानसभा चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) की जीत के साथ राज्य की बागडोर संभालने जा रहे जोरामथंगा ने मंगलवार को कहा कि वह अपनी पार्टी के चुनावी वादे के तहत राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करेंगे. 20 फरवरी 1997 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ईसाई बहुल और अत्यधिक साक्षर इस राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी. हालांकि मिजोरम शराब निषेध और नियंत्रण कानून 2014 के लागू होने के बाद 2015 में प्रतिबंध हटा लिया गया था. इसके बाद 16 मार्च 2015 को राज्य में शराब की दुकानें खुल गई.

तेलंगाना और मिजोरम में वोटर्स ने राष्ट्रीय पार्टियों को नकारा, TRS और MNF पर जताया भरोसा

इस चुनाव में शराबबंदी बड़ा मुद्दा था. इसलिए राज्य की बागडोर संभालने जा रहे जोरामथंगा ने सबसे पहले शराबबंदी पर बयान दिया और इसे लागू करने की बात कही. नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री एमएनएफ के जोरमथंगा ने कहा कि जनता ने शायद शराब से प्रतिबंध हटाने के कारण ललथनहवला को नकार दिया. दूसरी ओर पिछले 10 सालों से सरकार में रही कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा. राज्य में विकास कार्य नहीं होने से भी लोग नाराज थे. हालांकि राज्य में भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था लेकिन कांग्रेस की नई नीतियों को लेकर लोगों में नाराजगी थी. इसके अलावा जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेपीएम) के उदय के कारण भी कांग्रेस को नुकसान हुआ. कांग्रेस प्रवक्ता ललीआनचुंगा के अनुसर जेपीएम ने उनकी पार्टी और एमएनएफ दोनों को नुकसान पहुंचाया.