आर्टिकल 35A पर सुप्रीम कोर्ट में बदल गए मोदी सरकार के सुर, 3 महीने की मोहलत मिली

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने 8 हफ्ते का वक्त मांगा. लेकिन क्यों?

Published: October 30, 2017, 9:12 PM IST

नई दिल्ली। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की विशेष बेंच ने आज आर्टिकल 35ए पर सुनवाई की. लेकिन सुनवाई के दौरान मोदी सरकार के सुर चौंकाने वाले थे. इस मसले पर खुले मंच पर मुखर रहने वाली केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अलग ही राग अलापा. केंद्र सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने हलफनामा देकर नोटिस पर जवाब देने के लिए आठ हफ्ते का वक्त मांगा है. इसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई टाल दी.

केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने हलफनामा देकर कहा कि घाटी में शांति के लिए स्थापित करने के लिए केंद्र की ओर से मध्यस्थ (इंटर लोकेटर) नियुक्त किया गया है. और इस पर किसी भी तरह को कोई फैसला सरकार के शांति प्रयासों में बाधा उत्पन्न करेगा. इसलिए सरकार का पक्ष रखने के लिए समय दिया जाए. राजनीतिक विश्लेषक इसके अलग-अलग अर्थ निकाल रहे हैं. माना जा रहा है कि गुजरात-हिमाचल में चुनाव और जम्मू-कश्मीर के लिए वार्ताकार की नियुक्त के चलते सरकार इस मुद्दे को फिलहाल टालना ही बेहतर समझ रही है.

अनुच्छेद 35ए भारतीय संविधान में एक ‘प्रेंसीडेशियल आर्डर’ के जरिए 1954 में जोड़ा गया था. 14 मई 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ओर से जारी आदेश के जरिए संविधान में एक नया अनुच्छेद 35 A जोड़ दिया गया. यह अनुच्छेद जम्मू कश्मीर विधान सभा को अधिकार देता है कि वो राज्य के स्थायी नागरिक की परिभाषा तय कर सके. इन्हीं नागरिकों को राज्य में संपत्ति रखने, सरकारी नौकरी पाने या विधानसभा चुनाव में वोट देने का हक मिलता है.

विभाजन के बाद जम्मू कश्मीर में बसे लाखों लोग वहां के स्थायी नागरिक नहीं माना जाता है. वे यहां सरकारी नौकरी और सरकारी सुविधाएं पाने के हकदार नहीं हैं. ये लोग लोकसभा चुनाव में तो मतदान कर सकते हैं लेकिन राज्य पंचायत या विधानसभा के चुनाव में मत नहीं डाल सकते.

जम्मू कश्मीर के संविधान के मुताबिक, स्थायी नागरिक वह व्यक्ति है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 सालों से राज्य में रह रहा हो और उसने वहां संपत्ति हासिल की हो. साल 2014 में एक एनजीओ ‘वी द सिटीजन’ ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस आर्टिकल को समाप्त करने की मांग की थी. एनजीओ का कहना है कि अनुच्छेद 35ए भारत की एकरूपता की अवधारणा के उलट है. इससे भारतीय नागरिकों के बीच वर्ग के भीतर वर्ग उत्पन्न होता है.

याचिका का विरोध करने वालों का कहना है कि अगर अनुच्छेद 35ए हटा लिया जाता है तो जम्मू कश्मीर पहले जैसा नहीं रह जाएगा. यहां कोई भी जमीन ले सकेगा और यहां का नागरिक बन जाएगा. उसे वोट देने का अधिकार मिल जाएगा और इस मुस्लिम बहुल राज्य की जनसांख्यिकी बुरी तरह प्रभावित होगी. इस मुद्दे पर पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस एक साथ हैं और दोनों विरोधी पार्टियों ने एक साथ आने का ऐलान किया है.

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