नई दिल्ली. किसी भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का फिलीस्तीन जाना न सिर्फ ऐतिहासिक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की संतुलित विदेश नीति का शानदार नमूना भी है. आज जब रामल्ला में प्रधानमंत्री मोदी अपने कदम रखेंगे तो केवल फिलीस्तीन ही इससे खुश नहीं होगा, अरब के तमाम मुस्लिम देश भी खुश होंगे जो भारत और इजरायल के बीच लगातार बढ़ते गठजोड़ से चिंतित थे. Also Read - भाजपा के 'चाणक्य' गृहमंत्री अमित शाह को पीएम मोदी ने दी जन्मदिन की बधाई, कही ये बात

दरअसल, देश में भाजपा या गैर कांग्रेसी सरकार बनने के बाद इजरायल-भारत संबंध हर बार चर्चा में आ जाता है. कई विशेषज्ञ इस बात की पैरवी करने लगते हैं कि कश्मीर के मुद्दे पर खुलकर हमारे साथ आने वाले इजरायल को फिलीस्तीन से ज्यादा तवज्जो दी जाए. लेकिन नेहरू के तीसरी दुनिया की एकता और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित भारत की विदेश नीति ने कभी इसे मंजूर नहीं किया. ऐसे में मोदी सरकार बनने के बाद इजरायल-भारत के बीच गहराते रणनीतिक संबंधों से फिलीस्तीन समेत सभी खाड़ी देश चिंतित थे कि कहीं अब भारत अपनी नीतियों में बदलाव तो नहीं करेगा. इस धारणा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे के वक्त काफी टीका-टिप्पणी भी हुई थी. लेकिन यरूशलम को इजरायल की राजधानी बनाने के मामले में संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग के समय भारत का फिलीस्तीन के पक्ष में खड़ा होना और पीएम मोदी के फिलीस्तीन दौरे ने ऐसी तमाम धारणाओं और टिप्पणियों को धता बता दिया है. Also Read - नवरात्रि 2020 पर बंगाल के लोगों से आज जुड़ेंगे PM मोदी, 'पुजोर शुभेच्छा' के जरिए जनता को देंगे खास संदेश

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इजरायल को मान्यता, दोस्ती फिलीस्तीन से भी

1948 में इजरायल के गठन के दो साल बाद पंडित नेहरू ने इजरायल को मान्यता दे दी थी. लेकिन अरब देशों को यह यकीन दिलाया था कि यह फिलीस्तीन की शर्त पर नहीं होगा. साथ ही इजरायल और फिलीस्तीन के बीच सीमा विवाद को लेकर भी भारत का दृष्टिकोण हमेशा से स्पष्ट रहा है कि वह इजरायल के इकतरफा दावे के पक्ष में नहीं है. फिलीस्तीन को समर्थन देने, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके साथ खड़े होने के बाद भी भारत ने हालांकि फिलीस्तीन को 1988 में मान्यता दी. लेकिन इस बीच इजरायल के साथ भी हमारी दोस्ती सीमित रही. इजरायल के नेता मोशे डयान 1977 में कूटनीतिक रिश्ते कायम करने गुपचुप तरीके से भारत आए, पर वे सफल नहीं हुए. दरअसल, भारत इस मामले में हमेशा से संतुलन बनाकर चल रहा है. वह इजरायल के हमलावर रवैये के साथ नहीं है. साथ ही फिलीस्तीन के हिंसक संघर्ष को भी समर्थन नहीं देता.

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मोदी के दौरे के मायने

पीएम मोदी की फिलीस्तीन यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जबकि लगभग एक महीने पहले ही इजरायली प्रधानमंत्री भारत का दौरा कर लौटे हैं. ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री का दौरा एक संकेत भी है कि भारत ने इजरायल और फिलीस्तीन को लेकर अपनी नीतियों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया है. बीबीसी से बातचीत में भारत के पूर्व राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव रह चुके चिनमय गरेखान कहते हैं, ‘अगर मोदी पिछले साल जब इजरायल गए थे तो दो घंटे रामल्ला हो आते तो उन्हें अभी ऐसा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. कोई भी नेता जो इजरायल जाता है वो रामल्ला भी जरूर जाता है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री उस वक्त इजरायल को शायद खुश करने के लिए रामल्ला नहीं गए. वे पहले ऐसा कर लेते तो अभी उन्हें फिलीस्तीन नहीं जाना पड़ता.’ गरेखान कहते हैं कि भारत इस मामले में हमेशा से बैलेंसिंग नीति पर चल रहा है.