कैराना उपचुनाव के रिजल्ट आ गए हैं. बीजेपी अपनी यह सीट बचा नहीं पाई और गठबंधन की प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने बड़ी जीत दर्ज की. बीजेपी सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई सीट को बीजेपी किसी भी तरह खोने नहीं देना चाहती थी. इसके लिए पार्टी ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली. आइए जानते हैं बीजेपी के हार के कारण क्या हो सकते हैं… Also Read - Satara Lok Sabha bypoll Election 2019 result Live Updates: शिवाजी के वंशज और पर्दे के पीछे पवार के बीच टक्‍कर

1. बीजेपी ने इस सीट पर हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को उतारा था. मृगांका इससे पहले कैराना विधानसभा सीट पर साल 2017 में चुनाव लड़ चुकी थीं. लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी. तबस्सुम हसन के बेटे ने उन्हें मात दी. ऐसे में जिस तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद से मृगांका विधानसभा में हारी हों उसी तबस्सुम हसन के खिलाफ लोकसभा में वह कमजोर दिख रही थीं. प्रत्याशी का कमजोर होना बीजेपी के लिए बड़ी मुसीबत साबित हुआ. Also Read - कैरानाः मृगांका सिंह को टिकट नहीं देना भाजपा को पड़ सकता है भारी, नाराज है गुर्जर समाज

2. मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाटों ने साल 2014 और 2017 के चुनाव में बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था. लेकिन इसके बाद बदले समीकरण में बीजेपी जाटों को पूरी तरह से अपने पक्ष में करने में नाकामयाब साबित हुई. जो जाट एक समय राष्ट्रीय लोक दल के तगड़े समर्थक थे, उन्हीं को बीजेपी अपनी तरफ लाने में कामयाब हो गई थी. लेकिन, इस चुनाव में जयंती चौधरी ने जाटों को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की. Also Read - उपचुनाव नतीजों के बाद बीजेपी पर सहयोगियों ने तरेरी आंखें, कहा- फौरन सचेत होना जरूरी

3. कैराना में दलितों की नाराजगी भी बीजेपी की हार का बड़ा कारण साबित हुई. भीम आर्मी के उदय के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलितों में इसका प्रभाव बढ़ गया था. भीम आर्मी के संस्थापक रावण की गिरफ्तारी के बाद से उधर के दलित बीजेपी से नाराज चल रहे थे. कई टीवी चैनल की रिपोर्ट में ये बात सामने आई थी. ऐसे में बीजेपी उन्हें मनाने में कामयाब नहीं रही.

4. पश्चिमी यूपी में गन्ना किसानों की संख्या काफी है. लेकिन पिछले कई साल से चीनी मिलों की ओर से किसानों को उनके गन्ने का भुगतान नहीं हो रहा था. चुनाव में यह बड़ा मुद्दा था. किसानों में इसे लेकर नाराजगी थी. बीजेपी इसे भांप गई थी. सीएम आदित्यनाथ ने अपनी रैलियों में यह मुद्दा उठाया था और गन्ना किसानों की समस्या को दूर करने का वादा किया था. लेकिन परिणाम बता रहे हैं कि सीएम और बीजेपी के दूसरे नेता गन्ना किसानों को मनाने में नाकामयाब साबित हुए.

5. साल 2014 के लोकसभा और 22017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने विकास की बात की थी. विकास के वादा पर दौड़ रही बीजेपी कैराना में लोगों को इस बात को समझा नहीं पाई. एक महीने पहले हुए जिन्ना प्रकरण से भी उसे नुकसान पहुंचा है. सोशल मीडिया पर भी इस बात का जोर था कि जिन्ना या गन्ना. इससे साफ होता है कि गन्ना किसानों का रोष उसे किसानों से तो दूर ले गया, वहीं दूसरी तरफ जिन्ना प्रकरण उन्हें ऐसे लोगों से दूर ले गया, जिन्हें बीजेपी से विकास की उम्मीद थी.