नई दिल्लीः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना दौड़ने से पहले ही पटरी से उतरती दिख रही है. अहमदाबाद से मुंबई को जोड़ने वाली इस परियोजना को पिछले साल शुरू किया गया था लेकिन अब तक इसमें कोई खास प्रगति नहीं हुई है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस परियोजना के लिए 1400 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है, लेकिन अब तक एक हेक्टेयर जमीन का भी अधिग्रहण नहीं हो पाया है. इस परियोजना के लिए बनाई गई सरकारी कंपनी ने अब तक केवल 0.9 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया है. इस परियोजना के लिए किसान व्यापक स्तर पर जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. जिस गति से अभी जमीन का अधिग्रहण हो रहा है उससे इस परियोजना को 2023 तक पूरा करना संभव नहीं दिख रहा है. भारतीय रेलवे की सहायक कंपनी इस परियोजना को जापान के शिंकानसेन टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर बना रही है. ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर राघबेंद्र झा का कहना है कि भारत में जमीन अधिग्रहण में अड़ंगा एक सामान्य समस्या है और इस कारण कई परियोजनाओं में देरी होती है. Also Read - पीएम मोदी का सपना: जिस स्लीपर पर दौड़ेगी बुलेट ट्रेन, जापान से आई उसकी पहली खेप, देखें Photos

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इस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में परियोजनाओं के क्रियान्वयन में हो रही देरी की भी चर्चा की गई है. इसमें कहा गया है कि सितंबर 2018 में समाप्त तिमाही तक 2000 अरब रुपये की आधारभूत परियोजनाओं को पूरा किया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. 30 सितंबर तक केवल 754 अरब रुपये की ही परियोजनाएं पूरी की जा सकीं. राजनीतिक विश्लेषक और पीएम मोदी की जीवनी लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय का कहना है कि यह परियोजना सीधे तौर पर मोदी की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है. इसका खूब प्रचार प्रसार किया गया है. अगर लोग इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं तो कहीं न कहीं इससे मोदी की छवि को नुकसान पहुंचेगा.

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अदालत पहुंचा मामला

जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों के एक समूह ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दाखिल किया है. इस पर अदालत ने गुजरात सरकार से 22 नवंबर को जवाब देने को कहा है. इस याचिका में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के लिए जमीन अधिग्रहण के सरकार के अधिकार पर भी सवाल उठाया गया है. हालांकि कोर्ट ने पहले जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. द नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन नामक सरकारी कंपनी इस परियोजना को बना रही है. इस कंपनी का कहना है कि परियोजना के लिए पैसे की कमी नहीं है लेकिन जमीन अधिग्रहण में देरी हो रही है. उनका कहना है कि इस परियोजना को आधारिक तौर पर राष्ट्र को समर्पित किए जाने से एक साल पहले अगस्त 2022 तक इसे ऑपरेशनल किया जाना है.