नई दिल्‍ली: बिहार के बहुचर्चित मुजफ्फरपुर आश्रयगृह मामले (Muzaffarpur shelter home case) में दिल्‍ली की कोर्ट ने सोमवार यानि आज 20 जनवरी को इस आश्रयगृह केंद्र के संचालक व बिहार पीपुल्स पार्टी के  ब्रजेश ठाकुर समेत 19 लोगों को दोषी करार दिया है. अदालत दोषियों को 28 जनवरी सजा सुनाएगी.

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ कुलश्रेष्ठ ने ठाकुर को पोक्सो कानून के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न और सामूहिक बलात्कार का दोषी ठहराया. अदालत ने मामले के आरोपियों में से एक को आरोपमुक्त कर दिया. आश्रय गृह ठाकुर द्वारा चलाया जा रहा था. ठाकुर ने 2000 में मुजफ्फरपुर के कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र से बिहार पीपुल्स पार्टी (बीपीपा) के टिकट पर चुनाव लड़ा था और हार गया था. आरोपियों में 12 पुरुष और आठ महिलाएं शामिल थी.

 

बता दें कि 16 जनवरी को दिल्ली की एक अदालत ने मुजफ्फरपुर आश्रय गृह में कई लड़कियों के कथित यौन और शारीरिक शोषण मामले के मुख्य आरोपी की याचिका पर सीबीआई से 18 जनवरी तक जवाब मांगा था. याचिका में दावा किया गया था कि मामले में गवाहों के बयान विश्वसनीय नहीं हैं.

याचिका में कहा गया है कि सीबीआई ने 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में स्थिति रिपोर्ट दायर की थी, जिसमें कहा गया कि आश्रय गृह की कुछ लड़कियां जीवित हैं. इनके बारे में माना जा रहा था कि इनकी कथित तौर पर हत्या कर दी गई है. वकील पी. के. दुबे के जरिए दायर की गई ठाकुर की याचिका में दावा किया गया था कि आश्रय गृह यौन शोषण मामले में अभियोजन पक्ष के गवाह विश्वसनीय नहीं है और हत्या के आरोपों की जांच उनके बयानों पर आधारित है.

याचिका में कहा गया है कि निष्पक्ष मुकदमे के लिए ये तथ्य प्रासंगिक और आवश्यक हैं. याचिका में कहा गया था, यह जिक्र करना मुनासिब होगा कि हत्या के आरोपों की जांच दुष्कर्म पीड़िताओं के बयानों पर आधारित हैं, जो मामले में अभियोजन के गवाह हैं. उन्होंने अदालत में आरोपी के खिलाफ झूठे आरोप लगाए थे.

ये हैं गंभीर आरोप
कोर्ट ने बलात्कार, यौन उत्पीड़न, नाबालिगों को नशा देने, आपराधिक धमकी समेत अन्य अपराधों के लिए मुकदमा चलाया था.
ठाकुर और उसके आश्रय गृह के कर्मचारियों के साथ ही बिहार के समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों पर आपराधिक षड्यंत्र रचने, ड्यूटी में लापरवाही और लड़कियों के उत्पीड़न की जानकारी देने में विफल रहने के आरोप तय किए गए थे. इन आरोपों में अधिकारियों के प्राधिकार में रहने के दौरान बच्चों पर क्रूरता के आरोप भी शामिल थे, जो किशोर न्याय कानून के तहत दंडनीय है.

बिहार की समाज कल्याण मंत्री को देना पड़ा था इस्‍तीफा
अदालत ने सीबीआई के वकील और मामले के 20 आरोपियों की अंतिम दलीलों के बाद 30 सितंबर, 2019 को फैसला सुरक्षित रख लिया था. इस मामले में बिहार की समाज कल्याण मंत्री और तत्कालीन जद (यू) नेता मंजू वर्मा को भी आलोचना का शिकार होना पड़ा था जब उनके पति के ठाकुर के साथ संबंध होने के आरोप सामने आए थे. मंजू वर्मा ने आठ अगस्त, 2018 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दिल्‍ली में स्‍थानांतरित करने का आदेश दिया था
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस मामले को सात फरवरी, 2019 को बिहार के मुजफ्फरपुर की स्थानीय अदालत से दिल्ली के साकेत जिला अदालत परिसर की पॉक्सो अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया था.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल साइंसेज रिपोर्ट से मामला सामने आया था
यह मामला टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोसल साइंसेज (टिस) द्वारा 26 मई, 2018 को बिहार सरकार को एक रिपोर्ट सौंपने के बाद सामने आया था. इस रिपोर्ट में किसी आश्रय गृह में पहली बार नाबालिग लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न का खुलासा हुआ था. अदालत ने इस मामले में दोषियों को सजा सुनाने के लिए 28 जनवरी की तारीख तय की है.

मामले पर फैसला तीसरी बार 20 जनवरी तक के लिए टला था 
इससे पहले अदालत ने मामले पर फैसला तीसरी बार 20 जनवरी तक के लिए टाल दिया था.बता दें कि अदालत ने पहले आदेश एक महीने के लिए 14 जनवरी तक टाल दिया था. उस समय मामले की सुनवाई कर रहे जज सौरभ कुलश्रेष्ठ छुट्टी पर थे. इससे पहले अदालत ने नवंबर में फैसला एक महीने के लिए टाल दिया था. तब तिहाड़ केंद्रीय जेल में बंद 20 आरोपियों को राष्ट्रीय राजधानी की सभी छह जिला अदालतों में वकीलों की हड़ताल के कारण अदालत परिसर नहीं लाया जा सका था.

20 मार्च, 2018 को ठाकुर समेत आरोपियों के खिलाफ आरोप तय हुए थे 
अदालत ने 20 मार्च, 2018 को ठाकुर समेत आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे. आरोपियों में आठ महिलाएं और 12 पुरुष थे. कोर्ट ने दुष्कर्म करने और नाबालिगों के साथ दुष्कर्म करने की आपराधिक साजिश के आरोपों के लिए ठाकुर समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ 20 मार्च 2018 को आरोप तय किए थे.