दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेशनल हेराल्ड मामले में निचली अदालत के उस आदेश को मंगलवार को रद्द कर दिया, जिसमें कुछ दस्तावेज तथा कांग्रेस की साल 2010-11 की बैलेंस शीट सौंपने के लिए कहा गया था। मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा उपाध्यक्ष राहुल गांधी आरोपियों में शामिल हैं। न्यायमूर्ति पी.एस.तेजी ने आदेश पारित करने के लिए निचली अदालत की आलोचना की। न्यायालय ने कहा कि आरोपी पक्ष को अपने तर्क प्रस्तुत करने का मौका दिए बिना ही आदेश पारित कर दिया गया।

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निचली अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी की यचिका को मंजूरी दे दी थी, जिसमें उन्होंने साल 2010-11 के बीच कांग्रेस की बैंलेंस शीट तथा वित्त, शहरी विकास व कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय, दिल्ली विकास प्राधिकरण तथा रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज से एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल), हेराल्ड हाउस से संबंधित कुछ कागजातों की मांग की थी।

स्वामी द्वारा दायर मामले में सोनिया व राहुल गांधी के अलावा, पार्टी नेता मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नाडीस, सुमन दूबे, सैम पित्रोदा तथा यंग इंडियन लिमिटेड (वाईआई) भी आरोपी हैं।

वोरा, फर्नाडीस, दूबे, पित्रोदा तथा यंग इंडियन ने निचली अदालत के कागजात सौंपने के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए दलील दी थी कि आदेश पारित करने से पहले न तो उन्हें सम्मन किया गया और न ही उनका पक्ष सुना गया।

निचली अदालत के आदेश को दरकिनार करते हुए न्यायमूर्ति तेजी ने कहा, “कोई भी आदेश जारी करने से पहले आरोपी पक्ष को सुना जाना जरूरी है। यह न सिर्फ स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत का, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि स्वामी उसी याचिका को लेकर फिर से निचली अदालत जा सकते हैं।

स्वामी ने एजेएल के अधिग्रहण में धोखाधड़ी की एक शिकायत दर्ज कराई थी, जो यंग इंडियन द्वारा नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र का प्रकाशन करती थी। इस कंपनी में सोनिया गांधी व राहुल गांधी की 38-38 फीसदी की हिस्सेदारी है।