नई दिल्ली. विवादास्पद तीन तलाक विधेयक पर राज्यसभा में जब वोटिंग हो रही थी, उस दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के पांच-पांच सांसदों सहित विपक्ष के करीब 20 सांसद अनुपस्थित रहे. यह जानकारी सूत्रों ने दी. सदन में इन सांसदों की गैरमौजूदगी के कारण राज्यसभा में सरकार पर हावी रहने वाला विपक्ष कमजोर पड़ गया. तीन तलाक के कई प्रावधानों का विरोध कर रही कांग्रेस समेत अन्य पार्टियां, सत्ता पक्ष के संख्याबल के आगे मात खा गई. यह गौर करने वाली बात है कि विभिन्न पार्टियों द्वारा अपने-अपने सांसदों को व्हिप जारी किए जाने के बावजूद, ऐसा क्या हुआ कि ये 20 सांसद सदन से अनुपस्थित रहे और राज्यसभा में सरकार ने मात्र 15 वोटों से इस प्रस्ताव पर जीत दर्ज कर ली. सत्तारूढ़ दल ने ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019’ को राज्यसभा में 84 के मुकाबले 99 मतों से पारित करा लिया.

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राजनीति के जानकारों के लिए यह समझना कठिन नहीं है कि संसद में किसी महत्वपूर्ण बिल पर वोटिंग के समय कुछ सदस्यों की गैरमौजूदगी का अर्थ क्या होता है. अब इसे सत्तापक्ष की रणनीति कहा जाए या विपक्ष की एकता में पड़ी फूट, दोनों ही स्थितियों में यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है. खासकर कांग्रेस खेमे के दलों को तो इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि सिवाय संजय सिंह के, जिन्होंने मंगलवार को ही भाजपा में शामिल होने की घोषणा की थी, अन्य 4 सदस्यों का सदन में उपस्थित न होना, पर्दे के पीछे ‘खिचड़ी’ पकने का संकेत देता है. बहरहाल, कांग्रेस के राज्यसभा सदस्यों को अब पार्टी को कारण बताना पड़ेगा, क्योंकि विधेयक पर वोटिंग के दौरान सभी सांसदों की सदन में मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस ने व्हिप जारी किया था.

सूत्रों ने बताया कि विपक्ष के सदस्य अगर सदन में मौजूद होते तो वह विधेयक को प्रवर समिति के पास भिजवा सकता था. कांग्रेस के जो पांच सदस्य गैर हाजिर रहे उनमें विवेक तनखा, प्रताप सिंह बाजवा, मुकुट मिथी और रंजीब बिस्वाल के अलावा संजय सिंह भी हैं. संजय सिंह ने इससे पहले आज ही कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. कांग्रेस और सपा सदस्यों के अलावा राकांपा के वरिष्ठ नेता शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल भी सदन में अनुपस्थित रहे. इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, आईयूएमएल और केरल कांग्रेस के एक-एक सदस्य भी वोटिंग के दौरान गैर हाजिर रहे.

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वोटिंग के दौरान केटीएस तुलसी भी अनुपस्थित थे जो नामित सदस्य हैं, लेकिन वह विधेयक का विरोध करते रहे थे. विपक्षी दल के सदस्यों की गैर हाजिरी के अलावा अन्नाद्रमुक, बसपा और टीआरएस के सदस्य भी सदन में नहीं थे जिससे सरकार ने ऊपरी सदन में इस विधेयक को पारित करा लिया. यह जानते हुए भी कि सत्तारूढ़ दल के पास ऊपरी सदन में बहुमत नहीं है, तीन तलाक विधेयक पर वोटिंग के समय विपक्षी दलों के सांसदों की गैरमौजूदगी, संसदीय राजनीति के ‘नए संस्कार’ का संकेत देता है. अभी मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू ही हुआ है, संसद में इस तरह के कई और मौके आने हैं. ऐसे में विपक्षी सदस्यों का वैचारिक आपसी अंतर्विरोध, कई गुल खिलाएगा. इंतजार करिए!