नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर ‘किसान मुक्ति मार्च’ आंदोलन का मंच सजा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, शरद यादव, शरद पवार, फ़ारुख अब्दुल्ला, संजय सिंह, धर्मेंद्र यादव, जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार, सहित विपक्ष के तमाम नेता एक साथ आए. विपक्ष के नेताओं के भाषण के बीच मंच से कुछ दूरी पर लगे कैमरों के पास एक किसान, नेताओं द्वारा किसानों के लिए कही जा रही बात पर ‘लाल सलाम’ कहते हुए इतनी तेज तालियां पीट रहा था कि सामान्य नहीं लगता. आम तौर पर इतनी तेज हाथ पीटने पर किसी को हाथों में तेज़ दर्द हो जाए लेकिन किसान बेहद जोश में रहा.

करीब चार बजे राहुल गांधी के भाषण के बाद अरविंद केजरीवाल बोले और किसान मुक्ति मार्च ख़त्म हो गया. कई दिनों से किसान देश के कौने-कौने से चले. दो दिन तक दिल्ली में रहे, झंडे-बैनर, नारों, नाच-गानों, नाटक से सरकार को कोसा और चेतावनी दी… नेताओं के भाषण हुए और किसान लौट गए. एक सवाल दिमाग में है कि आखिर किसानों को इस मार्च, ऐसे आंदोलन से क्या हासिल है? पहले जो आंदोलन हुए उससे क्या हासिल हुआ? जोड़-घटाना कर यही हासिल जानने की कोशिश में देश के अलग-अलग हिस्सों से आये किसानों से बात भी की.

जंतर-मंतर से ग्राउंड रिपोर्ट: ‘गांव में मर रहे हैं, जो बचा उसके लिए यहां पहुंचे हैं’

क्या हासिल हुआ, क्या हासिल होगा, कितनी उम्मीद है, आंदोलन से क्या बटोर कर ले जा रहे हैं, के सवाल पर चंद्रमौली कुमार कहते हैं ‘हम जानते हैं अभी कुछ हासिल नहीं’. ये कहकर चलने के बीच रुकते हुए बिहार के नालंदा ज़िले से आये चंद्र मौली फिर बोलना शुरू करते हैं ‘अगर वे (सरकार) नहीं मानेंगे तो हम लड़ते रहेंगे. हार नहीं मानेंगे. वोट में देखेंगे’. चंद्रमौली के साथ नालंदा के मिर्ज़ापुर गांव से आए लक्ष्मी प्रसाद सिंह भी इसी बात की हां में हां मिलाते हुए कहते हैं कि ‘सरकार को कर्ज़ माफ करना चाहिए. हम यही चाहते हैं’

आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से आये किसान पूला पेडिरेड्डी को हिंदी उतनी नहीं आती. थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी, टूटी फूटी हिंदी और अपनी क्षेत्रीय भाषा में कहते हैं कि ‘फ्यूचर में फार्मर्स मुद्दा होगा. फार्मर्स सुसाइड से गुस्सा है. अगर सरकार कुछ नहीं करेगा तो अपोज़ीशन को सपोर्ट मिलेगा. कर्ज़ माफी, स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू हो… वरना बीजेपी एक, अपोज़ीशन 30 पार्टी एक.’ पूला पेडिरेड्डी का संकेत साफ़ है. मध्य प्रदेश से आये किसान रामचरन कहते हैं- हमें इस सरकार से कोई फायदा नहीं. आज यहां नेताओं ने अच्छी बातें कहीं. हम कर्ज़ से दबे हैं. अगर कर्ज माफ़ नहीं होगा तो हम आगे का सोचेंगे.

बिहार के रोहतास ज़िले से आईं बुजुर्ग फूलकली बात शुरू करते ही भड़क जाती हैं. कहती हैं कि ‘कुछ नहीं मिलेगा, इतना खर्चा हुआ. कर्ज़ है. बच्चे पैदा हो रहे हैं, परिवार बढ़ रहा है, उन्हें पढ़ाएंगे कैसे. गांव में पानी की दिक्कत है.’ वह कहती हैं कि बुधवार को गांव से ढेर भर रोटी बनाकर लाये थे. आचार भी लाये, दो दिन वही खाया, बैग में रखी हैं अब तक, कहो तो दिखाऊँ. देखते हैं क्या होता है.. हमने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी को देखा है, राहुल को भी देख लेंगे. कर्ज़ा माफ होना चाहिए.’ फूलकली ने गांव की कई समस्याओं के बारे में बातचीत की, लेकिन उनकी हर बात का निचोड़ कर्ज माफ़ी ही था.

जंतर-मंतर से लाइव: राहुल गांधी ने कहा- किसान जो कहेंगे, हम वो कर के दिखाएंगे

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के महेंद्र सिंह कहते हैं कि दो दिन में कुछ हासिल नहीं. ये हम जानते हैं. कुछ नहीं होगा तो हमारे पास एक ही हथियार है. हम वोट नहीं देंगे. बिहार के रमेश पासवान समस्याएं नहीं सुलझने पर ‘लड़ते रहेंगे’ की बात कहते हैं. किसानों के समर्थन के लिए जंतर-मंतर पहुंचे जेएनयू के स्टूडेंट हिमांशु कुमार कहते हैं ‘फिलहाल किसानों के खाते कुछ नहीं जाएगा. सवाल उठा है. शायद सरकारों को शर्म आये. मेरा गांव यूपी के बस्ती ज़िले में है, वहां फसल का ठीक दाम नहीं मिलता, गांव से कोई नहीं आया तो उनकी ओर से जेएनयू से मैं आ गया.’

देश भर से करीब 200 किसान संगठनों के हिस्सा लेने का दावा किया गया. किसान मुक्ति मार्च में संगठन और भी कई किसानों से बात हुई. एक बिल्कुल आम किसान इस बात से वाकिफ़ है कि कुछ होगा इसकी उम्मीद कम है. वह चाहता है कि हमारा कर्ज़ा माफ हो जाये बस. हमें कुछ और नहीं चाहिए.

किसानों से बोले राहुल गांधी- चाहे कानून बदलना हो या पीएम, कर्ज माफी के लिए हर काम करेंगे

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एकेएसए), कृषि विशेषज्ञ/पत्रकार पी. साईनाथ सहित अन्य आयोजकों का मांग पत्र करीब 23 बिंदुओं का था, लेकिन राहुल गांधी सहित अन्य नेताओं के भाषणों में कर्ज माफ़ी जैसी बात ही हावी रही. किसानों को भी कर्ज माफ़ी के बारे में ही पता है. किसानों को लगता है कि सभी समस्याओं की जड़ कर्ज ही है. आमतौर पर किसानों को और बातें नहीं पता और और वह बातों की बहुत अधिक बात भी नहीं करता है. यानी 23 बिंदुओं के मांग पत्र से शुरू हुआ ये आंदोलन कर्ज माफ़ी जैसी मांग पर अटक गया. बाकी सवाल पीछे छूट गए. इनमें से एक अहम् मांग कृषि संकट पर संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की थी, लेकिन उस पर नेताओं ने संसद का विशेष सत्र बुलाये जाने की मांग ही ठोस तरीके से नहीं की गयी.

ये पहला मौका नहीं है जब किसान इस तरह से गांव-गली से निकल सड़कों पर आ गए. इससे पहले महाराष्ट्र में ऑल इंडिया किसान सभा द्वारा महाराष्ट्र में किसान लॉन्ग मार्च हुआ. इसके बाद अक्टूबर में दिल्ली में किसानों ने जोर दिखाया. किसानों पर लाठी चार्ज हुआ. आंसू गैस के गोले छोड़े गए. किसानों द्वारा सुरक्षाबलों द्वारा मुकाबला किये जाने से ये आंदोलन खूब सुर्ख़ियों में रहा. इससे पहले इसी साल मार्च में स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू कराने के लिए अन्ना हजारे ने भी सत्याग्रह किया, फिर अब जंतर-मंतर पर किसान मुक्ति मार्च हुआ, लेकिन सवाल वही है, आखिर भारी भरकम खर्च, शारीरिक मानसिक श्रम किसानों के लिए कितना फायदेमंद होगा?