Nirbhaya Gangrape Case: तिहाड़ जेल (Tihar Jail) अधिकारियों ने आज दिल्ली सरकार से 2012 के दिल्ली गैंगरेप मामले में चार दोषियों की फांसी को स्थगित करने के लिए कहा और इस उद्देश्य के लिए नए सिरे से तारीख की मांग की है. उन्होंने कहा कि फांसी तब तक नहीं हो सकती जब तक कि दोषियों द्वारा दायर दया याचिका का निपटारा नहीं किया जाता. गौरतलब है कि निर्भया मामले में चारों दोषियों को 22 जनवरी को दिल्ली की एक अदालत द्वारा पिछले सप्ताह सुनाए गए फैसले के मद्देनजर फांसी दी जानी थी.

बता दें कि 16 दिसंबर 2012 को राष्ट्रीय राजधानी में एक चलती बस में 23 वर्षीय महिला के साथ आरोपियों ने गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया. न्यायाधीश सतीश कुमार अरोड़ा ने मामले के चार दोषियों- विनय शर्मा, अक्षय सिंह, पवन गुप्ता और मुकेश को 7 जनवरी को मौत की सजा सुनाई थी. गैंगरेप में शामिल पांचवे दोषी राम सिंह ने कथित तौर पर मुकदमे के दौरान तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली. इस पूरी घटना में एक नाबालिग भी शामिल था. नाबालिग को सुधार गृह भेजा गया और तीन साल बाद उसे रिहा कर दिया गया.

बता दें कि फांसी के मामले में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister Of Delhi)  मनीष सिसोदिया (Manish sisodiya) ने कहा कि मुकेश सिंह ने मंगलवार को दया याचिका दायर की थी, जिसे उनकी सरकार ने खारिज कर दिया. हालांकि, तिहाड़ जेल के अधिकारियों ने कहा कि अगर इस तरह की याचिका खारिज कर दी जाती है, तो भी मौजूदा नियमों को लागू करने से पहले दोषियों को 14 दिन का वक्त देना अनिवार्य है.

22 जनवरी को फांसी असंभव (Hanging Date In Nirbhaya Case)

गौरतलब है कि निर्भया मामले में दिल्ली सरकार ने बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायलय को सूचित किया कि चार दोषियों को तय कार्यक्रम के अनुसार 22 जनवरी को फांसी देना संभव नहीं है क्योंकि उनमें से एक की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है. अधिकारियों और पीड़िता की मां द्वारा यह दलील दिए जाने के बाद कि चारों दोषी अपनी फांसी को टालने के लक्ष्य से सुधारात्मक याचिका और दया याचिका दायर कर जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया में देरी कर रहे हैं, दिल्ली सरकार ने मुकेश कुमार की ओर से राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को दी गई दया याचिका खारिज करने की सिफारिश करते हुए उसे उपराज्यपाल के पास भेजा है. उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने संवाददाताओं से कहा कि यह कार्रवाई ‘‘बिजली की गति’’ से हुई है.

अधिकारियों ने जब अदालत को बताया कि जेल नियमों के अनुसार अब उन्हें अन्य दोषियों द्वारा भी दया याचिका दायर किए जाने और उसपर राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार करना होगा, पीठ ने यह कहते हुए नाराजगी जताई कि किसी ने दिमाग नहीं लगाया और पूरा तंत्र कैंसर से ग्रस्त है. अदालत ने मुकेश की ओर से दायर मौत के वारंट को चुनौती देने वाली अर्जी खारिज करते हुए उक्त बात कही. उच्च न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई गड़बड़ी नहीं है. उस आदेश को हमारे समक्ष चुनौती देना सिर्फ एक अदालत को दूसरे के समक्ष खड़ा करने के बराबर है.

व्यवस्था है कैंसरग्रसित (Cancer In System)

दिल्ली सरकार और तिहाड़ जेल के आधिकारियों ने न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति संगीता ढिंगरा सहगल की पीठ को बताया कि जेल नियमों के अनुसार, यदि किसी मुकदमे में एक से ज्यादा दोषियों को मौत की सजा दी गई है और उनमें से एक ने दया याचिका दायर की है तो उसपर फैसला होने तक अन्य की मौत की सजा भी टालनी होगी. दलीलें सुनने के बाद पीठ ने दिल्ली सरकार के स्थाई अधिवक्ता (अपराध मामलों के) राहुल मेहरा से कहा, ‘अगर आप सभी दोषियों द्वारा दया याचिका का विकल्प इस्तेमाल किए जाने तक कार्रवाई नहीं कर सकते, तो फिर आपके नियम खराब हैं. ऐसा लगता है कि किसी ने भी (नियम बनाते वक्त) दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया. व्यवस्था कैंसर से ग्रस्त है.’

निचली अदालत ने सात जनवरी को चार दोषियों मुकेश, विनय शर्मा, अक्षय कुमार सिंह और पवन गुप्ता को फांसी देने के वास्ते डेथ वारंट जारी करते हुए कहा कि उन्हें 22 जनवरी को सुबह सात बजे तिहाड़ जेल में फांसी दी जाएगी. पीठ ने मौत के वारंट को निचली अदालत में चुनौती देने की अनुमति देने के मुकेश के आवेदन को भी खारिज कर दिया. बाद में मुकेश ने अदालत से अनुरोध किया कि उसकी फांसी की तारीख आगे बढ़ा दी जाए क्योंकि उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है. याचिका अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सतीश कुमार अरोड़ा के समक्ष सुनवाई के लिए आई. अदालत ने इसपर राज्य और पीड़िता के माता-पिता को नोटिस भेजा है.

मामले को खींचना तिकड़म- कोर्ट (Court Remark In Case)

उच्च न्यायालय ने कहा कि उसका मानना है कि एक बार उच्चतम न्यायालय ने अगर मुकेश की आपराधिक मामलों की अपील, समीक्षा याचिका और सुधारात्मक याचिका रद्द कर दी है और मौत की सजा की पुष्टि कर दी है, ऐसे में वह सात जनवरी को जारी मौत के वारंट को अदालत के समक्ष चुनौती नहीं दे सकता है, क्योंकि आदेश में सिर्फ शीर्ष अदालत के फैसले का पालन किया गया है. पीठ ने कहा, ‘हमारा मानना है कि यह सिर्फ मामले को आगे खींचते रहने का तिकड़म है, क्योंकि 5 मई, 2017 को शीर्ष अदालत ने उनकी याचिकाएं खारिज दी थीं और उनके पास तभी से दया याचिका, समीक्षा याचिका या सुधारात्मक याचिका दायर करने का पर्याप्त समय था. आपने अभी तक इंतजार क्यों किया? किसने आपको ऐसा करने से रोका था? किसने आप पर रोक लगाई?’’

उन्होंने कहा, ‘कानून की मंशा आपको अदालत जाने के लिए तर्कपूर्ण समय देने की है. आपका समय पांच मई, 2017 से ही शुरू हो गया था. यहां तक कि 29 अक्टूबर, 2019 (जब दोषियों को दया याचिका दायर करने के विकल्प का पहला नोटिस भेजा गया) के बाद भी आपने कुछ नहीं किया. आप अन्य दोषियों की दया याचिकाओं पर फैसले का इंतजार नहीं कर सकते हैं.’’ जेल अधिकारियों ने पीठ को बताया कि नियमों के तहत उन्हें मौत के वारंट की तामील करने से पहले दया याचिका पर फैसले का इंतजार करना होगा. इसपर अदालत ने कहा, ‘‘अपने घर को दुरुस्त करें.’’

तंत्र से उठेगा लोगों का भरोसा (Court Remark In Nirbhaya Case)

पीठ ने कहा, ‘‘आपके घर की हालत ठीक नहीं है. दिक्कत यह है कि लोगों का तंत्र से भरोसा उठ जाएगा. चीजें सही दिशा में नहीं जा रही हैं. तंत्र का दुरुपयोग किया जा सकता है और हम व्यवस्था का दुरुपयोग करने का तिकड़म देख रहे हैं, जिसे इसकी खबर ही नहीं है.’’ मेहरा ने अदालत को बताया कि अगर 21 जनवरी तक दया याचिका पर फैसला नहीं हुआ तो उन्हें 22 जनवरी से इतर दूसरी तारीख पर मौत के वारंट के लिए उन्हें सत्र अदालत जाना होगा. उन्होंने कहा, अगर दया याचिका 22 जनवरी के बाद भी खारिज होती है, उस स्थिति में भी सभी दोषियों के लिए नए सिरे से मौत का वारंट जारी करने के लिए निचली अदालत जाना होगा.

जेल अधिकारियों की खिंचाई करने के अलावा अदालत ने मुकेश द्वारा देर से सुधारात्मक और दया याचिका दायर किए जाने पर अप्रसन्नता जताई. उसने कहा कि मई 2017 में ही सभी याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं, ऐसे में देरी क्यों. पीठ ने दोषियों को दया याचिका के विकल्प के संबंध में देर से सूचित करने को लेकर जेल अधिकारियों की खिंचाई की. जेल अधिकारियों ने दोषियों को 29 अक्टूबर और 18 दिसंबर को नोटिस जारी कर सूचित किया था कि अब वे दया याचिका दायर कर सकते हैं. मेहरा ने पीठ को बताया कि चूंकि दोषियों में से एक अक्षय ने 2019 तक अपनी समीक्षा याचिका दायर नहीं की थी और उसपर 18 दिसंबर को फैसला हुआ, इसलिए देरी हुई. अन्य तीन दोषियों की समीक्षा याचिकाएं जुलाई 2018 में ही खारिज हो चुकी थीं. निर्भया कांड के चार दोषियों को 22 जनवरी को फांसी देना संभव नहीं : दिल्ली सरकार ने अदालत को बताया.

(इनपुट-भाषा)