नई दिल्ली. भारतीय न्यायपालिका में किसी मामले को साबित करने के लिए अभियोजन और बचाव पक्ष तमाम तरह के तर्क देते हैं. इसमें कुछ नया नहीं है, लेकिन असम के एक व्यक्ति की हत्या के बाद उसकी पत्नी को केवल इसलिए दोषी करार दे दिया गया क्योंकि वह घटना के बाद रोई नहीं थी. पुलिस के इसी तर्क के आधार महिला को दोषी करार दिया गया. उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और वह पांच सालों तक सलाखों के पीछे भी रही. अब सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के इस तर्क को खारिज कर महिला को बरी कर दिया है. Also Read - कोरोना वायरस के बारे में सही सूचना के लिये 24 घंटे में पोर्टल बनाये केन्द्र: सुप्रीम कोर्ट

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के इस तर्क को खारिज कर महिला को बरी कर दिया. दरअसल, इस मामले में निचली अदालत ने जो फैसला दिया था उसे गुवाहाटी हाईकोर्ट ने बरकरार रखते हुए कहा था कि पति की हत्या के बाद महिला का न रोना अप्राकृतिक व्यवहार था, जो उसे बिना किसी संदेह के दोषी साबित करता है. निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उस सिद्धांत पर जोर दिया कि हत्या की रात अंतिम बार महिला और उसके पति को साथ देखा गया था. इसके अलावा हत्या के बाद पत्नी का नहीं रोना यह साबित करता है कि वह अपने पति का हत्यारा थी. Also Read - Covid-19: कोरोना के चलते मजदूरों का पलायन, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- 23 लाख लोगों को दे रहे हैं खाना

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आरएफ नरीमन और नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर यह कहना ठीक नहीं है कि महिला ने ही अपने पति की हत्या की. इसके बाद पीठ ने महिला को जेल से रिहा करने का आदेश दिया. पीठ ने कहा कि सच्चाई यह है कि अभियोजन पक्ष के गवाह को महिला की आंखों में आंसू नहीं दिखी. अदालत ने इसे अप्राकृतिक व्यवहार मान लिया, लेकिन इसके आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.