नई दिल्ली: चुनाव के एलान के बाद दिल्ली से लगभग 1700 किलोमीटर दूर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. राज्य में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ हो रहे हैं. मैदान में तीन बड़ी पार्टियां हैं. सत्ताधारी बीजू जनता दल, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस. 72 वर्षीय नवीन पटनायक पिछले 18 साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं. आज भी ठीक से उड़िया नहीं बोल पाने वाले पटनायक को राज्य की जनता ने हर बार ज्यादा सीटें जीताकर सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया है. ओडिशा के 3.18 करोड़ मतदाता क्या पांचवी बार नवीन पटनायक को राज्य की कमान सौपेंगे? या बूढ़े होते नवीन पटनायक की जगह बीजेपी के 49 वर्षीय नेता धर्मेंद्र प्रधान को सीएम बनाएंगे. बीजेपी के मजबूत होने से अपना आधार खो रही कांग्रेस क्या राज्य में कोई चमत्कार कर पाएगी? तलाशते हैं ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब.

बीजू जनता दल
यह कहना गलत नहीं होगा कि नवीन पटनायक ओडिशा की राजनीति के धुरी हैं. देश की आजदी से एक साल पहले जन्म लेने वाले नवीन पटनायक को राजनीति विरासत में मिली है.उनके पिता बीजू पटनायक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. पिता की मौत के बाद 1998 में नवीन ने पिता के नाम पर राजनीतिक पार्टी बनाई.नवीन ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत लोकसभा का उपचुनाव लड़कर सांसद के रूप में की, बाद में वह केंद्र में मंत्री बने. सन 2000 में बीजेपी की मदद से वह उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने. तब से वह सीएम हैं. 2009 में नवीन पटनायक ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था. नवीन पटनायक की यूएसपी है उनकी छवि और इसी छवि के आधार वह 5वीं बार मैदान में उतरने जा रहे हैं. बीजेडी ने अकेले चुनाव लड़ने का एलान किया है. पिछले कुछ महीनों में सरकार ने कई नई परियोजना का ऐलान किया है और उसे उम्मीद है कि इसका फायदा उसे चुनाव में मिलेगा.

चुनौती
राज्य में आक्रामक तरीके से चुनाव प्रचार कर रही बीजेपी नवीन पटनायक की उसी साफ सुथरी छवि पर चोट कर रही है. बीजेपी सीएम पर भ्रष्टाचार के दानव को बड़ा करने का आरोप लगाती रही है. पीएम मोदी खुद अपनी रैलियों में कह चुके हैं कि राज्य में भ्रष्टाचार का दानव मजबूत हो रहा है और सवाल यही है कि इन दानवों को पाल कौन रहा है. हालांकि ये भी सच है कि भले ही बीजेडी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हों लेकिन सीएम ने अपनी बेदाग छवि को बरकरार रखा है. दिसंबर 2018 में हुए दो राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. इन दोनों राज्यों में बीजेपी की 15 सालों से सरकार थी. विपक्ष को उम्मीद है कि यह करिश्मा ओडिशा में भी हो सकता है. बीजेडी को पार्टी छोड़कर जा रहे नेताओं से भी पार पाना होगा.

बीजेपी
2014 के विधानसभा चुनाव में सीटें जीतने के मामले में बीजेपी तीसरे नंबर पर रही थी, लेकिन 2016 में ओडिशा के लोकल बॉडी इलेक्शन में बीजेपी ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी. इस चुनाव में कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही थी. ओडिशा में बीजेपी का फंडा क्लियर है. खुद को प्रमुख विपक्ष के रूप में पेश करो और धीरे-धीरे राज्य में पार्टी का विस्तार करो. ओडिशा में कोई और पार्टी नहीं है जिससे बीजेपी गठबंधन कर सके. स्थानीय बीजेपी कैडर में जान फूंकने के लिए पीएम मोदी कई बार राज्य का दौरा कर चुके हैं. केंद्र की एनडीए सरकार ने राज्य में कई योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया है. बीजेपी भ्रष्टाचार के मुद्दे को पूरे जोर शोर से उठा रही है. पार्टी ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को नवीन पटनायक के सामने बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया है. 18 साल की एंटी इनकंबेसी का बीजेपी कितना फायदा उठा पाएगी ये तो रिजल्ट आने के बाद ही पता चलेगा.

कांग्रेस
पिछले विधानसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस की झोली में 16 सीटें आई थीं और उसे 25.71 प्रतिशत वोट मिले थे. अप्रैल 2018 में कांग्रेस ने पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता निरंजन पटनायक को ओडिशा का नया कांग्रेस अध्यक्ष बनाया. साथ ही तीन नए कार्यकारी अध्यक्ष बनाए. कांग्रेस निरंजन पटनायक के नेतृत्व में अपनी खोई हुई साख वापस पाने कि कोशिश में जी जान से जुटी है. कांग्रेस में गुटबाजी कम हुई है. राहुल गांधी पिछले कुछ समय में राज्य का चार बार दौरा कर चुके हैं. कांग्रेस लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि बीजेडी और बीजेपी के बीच गठबंधन है. हालांकि बीजेडी और बीजेपी दोनों किसी तरह के गठबंधन के आरोप का खंडन करते रहे हैं. हालांकि अगर कांग्रेस लोगों को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रही तो इसका फायदा उसे मिल सकता है.